भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ब्राह्मणका पत्नीके प्रति अपने ज्ञाननिष्ठ स्वरूपका परिचय देना ब्राह्मण उवाच नाहं तथा भीरु चरामि लोके यथा त्वं मां तर्जयसे स्वबुद्ध्या । विप्रोऽस्मि मुक्तोऽस्मि वनेचरोऽस्मि गृहस्थधर्मा व्रतवांस्तथास्मि ॥ १ ॥ नाहमस्मि यथा मां त्वं पश्यसे च शुभाशुभे । मया व्याप्तमिदं सर्वं यत् किंचिज्जगतीगतम् ॥ २ ॥ ब्राह्मणने कहा—भीरु! तुम अपनी बुद्धिसे मुझे जैसा समझकर फटकार रही हो, मैं वैसा नहीं हूँ। मैं इस लोकमें देहाभिमानियोंकी तरह आचरण नहीं करता। तुम मुझे पाप- पुण्यमें आसक्त देखती हो; किंतु वास्तवमें मैं ऐसा नहीं हूँ। मैं ब्राह्मण, जीवन्मुक्त महात्मा, वानप्रस्थ, गृहस्थ और ब्रह्मचारी सब कुछ हूँ। इस भूतलपर जो कुछ दिखायी देता है, वह सब मेरेद्वारा व्याप्त है ॥ १-२ ॥ ये केचिज्जन्तवो लोके जङ्गमाः स्थावराश्च ह । तेषां मामन्तकं विद्धि दारूणामिव पावकम् ॥ ३ ॥ संसारमें जो कोई भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबका विनाश करनेवाला मृत्यु उसी प्रकार मुझे समझो, जिस प्रकार कि लकड़ियोंका विनाश करनेवाला अग्नि है ॥ ३ ॥ राज्यं पृथिव्यां सर्वस्यामथवापि त्रिविष्टपे । तथा बुद्धिरियं वेत्ति बुद्धिरेव धनं मम ॥ ४ ॥ सम्पूर्ण पृथ्वी तथा स्वर्गपर जो राज्य है, उसे यह बुद्धि जानती है; अतः बुद्धि ही मेरा धन है ॥ ४ ॥ एकः पन्था ब्राह्मणानां येन गच्छन्ति तद्विदः । गृहेषु वनवासेषु गुरुवासेषु भिक्षुषु ॥ ५ ॥ ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रममें स्थित ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण जिस मार्गसे चलते हैं, उन ब्राह्मणोंका वह मार्ग एक ही है ॥ ५ ॥ लिङ्गैर्बहुभिरव्यग्रैरेका बुद्धिरुपास्यते । नानालिङ्गाश्रमस्थानां येषां बुद्धिः शमात्मिका ॥ ६ ॥ ते भावमेकमायान्ति सरितः सागरं यथा ।