अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
अनुरागसागर वाणी
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साहिब ने कहा
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । दशै मास प्रगटै जिव कासा ॥ तुम गृह आय लेहि अवतारा । हंसन काज देह जग धारा ॥ धर्मदास सुनु शब्द सिखापन । कहौं सैदेश जानि हित आपन ॥ वस्तु भंडार दीन तुम पांही । सौंपहु वस्तु बतावहु ताही ॥ अब जो होइ हैं पुत्र हमारा । सो तो होइ हैं अंश हमारा ॥
साहिब ने कहा कि 10 महीने बाद तुम्हारे घर में एक अवतार होगा, जो वस्तु मैंने तुम्हें दी है, वही तुम उसे देना, वो जो तुम्हारा पुत्र होकर आयेगा, वो मेरा ही अंश होगा।
धर्मदास अस विनती लायी । हे प्रभु मोकहैं कहु समझाई ॥ हे पुरुष हम इन्द्री वश कीन्हा । कैसे अंश जनम जग लीन्हा ॥
धर्मदास ने कहा कि अब तो मैंने इन्द्री वश में की है, अब कैसे होगा। तब साहिब ने उसे समझाया कि वो नाद पुत्र होगा।
तब आयसु साहब अस भाखे । सुरति निरति करि आज्ञा राखे ॥ पारस नाम धर्मनि लिखि देहु जाते अंश जन्म सो लेहु ॥ लखहु सैन मैं दऊँ लखाई । धर्मदास सुनियो चितलाई ॥ लिखो पान पुरुष सहिदाना । आमिन देहु पान परवाना ॥
साहिब ने कहा कि अपनी स्त्री को नाम दो। तब धर्मदास जी की शंका समाप्त हुई और उन्होंने आमिन को बुलवाकर साहिब के चरण पकड़ने को कहा, पारस नाम दिया। इस तरह सुरति से गर्भवास हुआ और चूरामणि साहिब प्रगट हुए।
तब गयठ धर्मदास कह शंका । दृष्टि समीप कीन्हा परसंगा ॥ धर्मदास आमिन हँकरावा । लाय खसम के चरन परावा ॥ पारस नाम पान लिख दीन्हा । गरभवास आसा सा लीन्हा ॥
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साहिब बन्दगी
रति सुरति सो गरभ जो भयऊ। चूरामनि दास बास तहँ लयऊ॥ धरमदास परवाना दीन्हा। आमिन आय दंडवत कीन्हा॥ दसों मास जब पूजी आसा। प्रगटे अंश चूरामणि दासा॥
तब साहिब उसके घर गये और कहा कि अब तुम्हारे 42 वंश होंगे। फिर उनकी शाखाएँ, परशाखाएँ होंगी, सकल जीवों को वे तारेंगे।
तुमते वंश बयालिस होई। सकल जीवकहँ तारै सोई॥ तिनसों साठ होइ हैं शाखा। तिन शाखन ते होइ हैं परशाखा॥ दश सहस्र परशाख तुम है हैं। वंशन साथ सबै निरनहिहैं॥ नाता जान करे अधिकई। ताकहँ लोक बदों नहिं भाई॥ जस तुम्हार हुइ है कडिहारा। तैसे जानो साख तुम्हारा॥
कहा कि 42 वंश से आगे 360 शाखाएँ होंगी, फिर उसकी 10 हजार परशाखाएँ होंगी। जैसे मैंने तुम्हें नाम परवाना सोंपा है, वैसे ही तुम्हारे वंशों को भी सोंपा जायेगा। वो सब नाद पुत्र होंगे, शब्द पुत्र होंगे। ताते तोहि कहौं समझाई। अपने वंसन देहु चिताई॥ नाद पुत्र जो परगट होई। ताको मिलै प्रेम से सोई॥ तुमहु नाद पुत्र मम आहु। यह मन परखहु धर्मनि साहु॥ कमाल पुत्र जो मूत्र जियावा। ताके घट में दूत समावा॥ पिता जानि तिन आहंग कीन्हा। तब हम थाति तोहि कहँ दीन्हा॥ हम हैं प्रेम भगति के साथी। चाहों नहीं तुरी औ हाथी॥ प्रेम भक्ति से जो मोहिं गहिहैं। सो हंस मम हृदय समैहैं॥ अहं कारते होतेऊ राजी। तौ मैं थापत पंडित काजी॥ अधीन देखि थाति तेहि दीना। देखेउ जब तोहिउँ प्रेम अधीना॥ ताते धरमनि मानु सिखाई। नाप थाती सौँपिहु भाई॥ नाद पुत्र कहँ सौँपिहु सोई। पंथ उजागर जासों होई॥ बंस करिहैं अहं कार बहुता। हम हैं धर्मदास कुल पूता॥
अनुरागसागर वाणी
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जहाँ हंग तहवाँ हम नाहीं । धरमदास देखु परखि मन माहींं ॥ जहाँ हंग तहँ काल सरूपा । नहिं पावे सत लोक अनूपा ॥
साहिब ने समझाया कि शब्द पुत्र को ही गद्दी सौंपनी है । कमाल को मैंने जीवित किया था, पर उसने अंहकार किया, मुझे पिता माना, इसलिए मैंने नाम का परवाना तुम्हें सोंपा, उसे नहीं । हे धर्मदास ! मैं प्रेम का भूखा हूँ, मुझे हाथी-घोड़े नहीं चाहिँ। यदि अंहकार से मैं अधीन होता तो पंडित-काजियों को यह काम सौंप देता । जहाँ अंहकार है, वहाँ हम नहीं, काल है, इसलिए वो जीव अमर लोक नहीं जा सकता ।
धर्मदास का बेटा नारायणदास साहिब का निंदक था, उसने नाम नहीं लिया, साहिब ने कहा कि यह काल का बंदा है, इसे त्याग दो, पर धर्मदास बार-बार साहिब से प्रार्थना करते कि उसे भी नाम दो, तब साहिब ने उससे कहा कि तुम पुत्र मोह में नहीं पड़ो, गुरुमुख बनो । साहिब ने उसे समझाया-
गुरु आज्ञा जो निरखत रहई । ताकर खूट काल नहिं गहई ॥ गुरु पद रहे सदा लौ लीना । जैसे जलहि न बिसरत मीना ॥ गुरु के शब्द सदा लौ लावे । सत्य नाम निसदिन गुण गावे ॥ पुरुष नाम को अस परभाऊ । हँसा बहुरि न जगमहँ आऊ ॥ निश्चय जाय पुरुष के पास । कूर्म कला परखहु धर्मदासा ॥
इसलिए-
जब लग तन में हँस रहाई । निरखे शब्द पंथ चले भाई ॥ जैसे शूर खेत रह मांड़ी । जो भागे तो होवे भांड़ी ॥ संत खेत गुरु शब्द अमोला । यम तेहि गहे जीव जो डोला ॥ गुरु विमुख जिव कतहुँ न बाचै । अग्नि कुंड महँ जरि बरि नाचै ॥ सासति होय अनेकन भाई । जनम जनम सो नर्कहि जाई ॥
142
साहिब बन्दगी
गुरु दयाल तो पुरुष दयाला। जेहि गुरुमुख छुए न काला॥ जीव कहो परमारथ जानी। जो गुरु भक्त ताहि नहिं हानी॥ कोटिक योग अराधे प्रानी। सतगुरु बिन जीव की हानी॥ सतगुरु अगम गम्य बतलावे। जाकी गम्य वेद नहिं पावे॥ वेद जाहि ते ताहि बखाने। सत्य पुरुष का मरम न जाने॥ कोई इक हंस विवेकी होवे। सत्य शब्द जो गही बिलोवे॥ कोटि माहिं कोइ संत विवेकी। जो मम बानी गहे परे खी॥ फंदे सबै निरंजन फंदा। उलटि न निज घर चीन्हे मंदा॥
गुरु गुरुन में भेद विचारा। गुरु-2 कहे सकल संसारा॥ गुरु सोइ जिन शब्द लखाया। आवागमन रहित दिखलाया॥ गुरु सजीवन शब्द लखावे। जाके बल हंस घर जावे॥ सो गुरु सों कछु अन्तर नीहीं। गुरु औ शिष्य मता एक आहीं॥
कहा-यदि ऐसा गुरु मिल जाए तो उसमें और परम पुरुष में कोई अन्तर नहीं मानना।
अनुरागसागर ग्रंथ कथि तोहि अगम गम्य लखाइया॥ पुरुष लीला काल को छल सबै वरनि सुनाइया॥ रहनि गहनि संत की, जौहरी जन बूझिहैं॥ परखि बानी जो गहे, तेहि अगम मारग सूझिहैं॥
अनुरागसागर वाणी
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आरती
जय सदगुरु देवा, स्वामी जय सदगुरु देवा, सब कुछ तुम पर अर्पण करहूँ पद सेवा।
जय गुरुदेव दया निर्धि, दीनन हितकारी, स्वामी भक्तन हितकारी, जय जय मोह विनाशक, जय जय तिभिर विनाशक, भय भंजन हारी। स्वामी जय...
ब्रह्मा विष्णु सदशिष्व, गुरु मूरति धारी, स्वामी प्रभु मूरति धारी, वेद पुराण बखानत, शास्त्र पुराण बखानत, गुरु महिमा भारी। स्वामी जय...
जप तप तीर्थ संयम, दान विधि दीन्हे, स्वामी दान बहुत दीन्हे, गुरु बिन ज्ञान न होवे, दाता बिन ज्ञान न होवे, कोटि यत्न कीन्हे। स्वामी जय...
माया मोह नदी जल, जीव बहे सारे, स्वामी जीव बहे सारे, नाम जहाज बिठाकर, शब्द जहाज चढ़ाकर, गुरु पल में तारे। स्वामी जय...
काम क्रोध, मद, लोभ, चोर बड़े भारी, स्वामी चोर बहुत भारी, ज्ञान खड़ग दे कर में, शब्द खड़ग देकर में, गुरु सब संहारे। स्वामी जय...
नाना पंथ जगत में निज-निज गुण गावें, स्वामी न्यारे-न्यारे यश गावें, सब का सार बताकर, सब का भेद लखा कर, गुरु मार्ग लावें। स्वामी जय...
गुरु चरणामृत निर्मल, सब पातक हारी, स्वामी सब दोषक हारी, वचन सुनत तम नासे, शब्द सुनत भ्रम नासे, सब संशय टारी। स्वामी जय...
तन, मन, धन सब अर्पण, गुरु चरणन कीजै, स्वामी दाता अर्पण कीजै, सदगुरु देव परमपद, सदगुरु देव अचलपद, मोक्ष गती लीजै। स्वामी जय...
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साहिब बन्दगी
आरती
आरति करहुँ संत सद्गुरु की, सद्गुरु सत्यनाम दिनकर की। काम, क्रोध मद, लोभ नसावन, मोह रहित करि सुरसरि पावन। हरहिं पाप कलिलमल की, आरति करहुँ संत सद्गुरु की ॥ सद्गुरु...
तुम पारस संगति पारस तब, कलिलमल ग्रसित लौह प्राणी भव। कंचन करहिं सुधर की, आरति करहुँ संत सद्गुरु की ॥ सद्गुरु...
भुलेहुँ जो जिव संगति आवें, कर्म भर्म तेहि बाँधि न पावें। भय न रहे यम घर की, आरति करहुँ संत सद्गुरु की ॥ सद्गुरु...
योग अग्नि प्रगटहिं तिनके घट, गगन चढ़े श्रुति खुले वज्रपट। दर्शन हों हरिहर की, आरति करहुँ संत सद्गुरु की ॥ सद्गुरु...
सहस्र कैवल चढ़ि त्रिकुटी आवें, शून्य शिखर चढ़ि बीन बजावें। खुले द्वार सतघर की, आरति करहुँ संत सद्गुरु की ॥ सद्गुरु...
अलख अगम का दर्शन पावें, पुरुष अनामी जाय समावें। सद्गुरु देव अमर की, आरति करहुँ संत सद्गुरु की ॥ सद्गुरु...
एक आस विश्वास तुम्हारा, पड़ा द्वार मैं सब विधि हारा। जय, जय, जय गुरुवर की, आरति करहुँ संत सद्गुरु की ॥ सद्गुरु...