भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

60 अपराजितपृच्छा अथ हंसयोगसाधनमाह – हकारादि सकारान्तं संस्मरेत्तदहर्निशम् । लक्षयेत्तत्र सञ्चारं वर्णोच्चारविवर्जितम् ॥ 12 ॥ अनन्तं सहजं हंसं नित्याभ्यासपदे स्थितम् । गमागमनयोगेन सप्तकोटिजपः स्मृतः ॥ 13 ॥ षट्त्रिंशदङ्गुलं चारे वामदक्षिणगोचरे । स्वयमुच्चार्यते हंसो हंसस्तेन स उच्यते ॥ 14 ॥ (उसके आगे) साधक को हंस-योग की साधना करनी चाहिए। इसके अभ्यास में हकार से आरम्भ करें और सकार से अन्त करें परन्तु ध्यान रखें कि यह प्राणायाम की साधना है जिसमें केवल प्राण के आवागमन को साक्षी भाव से लक्ष्य करके देखना है। आते श्वास में 'ह' की ध्वनि जैसा अभ्यास और जाते श्वास में 'स' की ध्वनि जैसा आभास मात्र करना है और किसी प्रकार का 'ह' वर्ण या 'स' वर्ण का वर्णोच्चार अर्थात् ध्वनि मुख उच्चारित नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार इस सहजयोग में अनन्त हंस के नित्याभ्यास से पद पर दृढ़ स्थिति प्राप्त होती है और इस सहजयोग में नित्य श्वास के आने-जाने के स्वरूप योग में सात करोड़ जप सहज ही प्रतिदिन होते रहते हैं— इस योग में मात्र श्वास पर आते-जाते समय लक्ष्य रखना है। इस सहजयोग के हंस प्राणायाम में नासिका के वाम व दक्षिण गोचर से अर्थात् चन्द्रनाड़ी व सूर्यनाड़ी से सञ्चरित होने वाले श्वास की लम्बाई छत्तीस अङ्गुल की होनी चाहिए अर्थात् व्यक्ति को सदा दीर्घ श्वास लेने का अभ्यास होना चाहिए। जिससे वायु में स्थित प्राणी की पूर्ण प्राप्ति होती रहे। इस योग की सहज प्रक्रिया में 'हंसो', 'सोऽहं' की ध्वनि स्वयं ही उच्चारित होती रहती है, इसीलिए इसे हंस (योग) कहा जाता है।¹

  1. तथा च योगगीतायां – शृणु राजन्यवक्ष्यामि हंसमन्त्रस्य साधनम्। यथोक्तं शम्भुना पूर्वं गिरिजायै महात्मना॥ हृदयादुत्थितः प्राणो बहिर्याति महीपते। द्वादशाङ्गुलमानेन नासाद्वारा निरन्तरम्॥ परावृत्य ततस्तूर्णं हृदयं प्रति गच्छति। हृदयाम्भोजतः पश्चाद्बहिरायाति सत्वरम्॥ एवं पुनः पुनः प्राणः श्वासोच्छ्वासक्रमेण वै। सर्वेषामेव जन्तूनां बहिरन्तः प्रधावति॥ निर्गमेहं भवेच्छब्दः प्रवेशे सः प्रकीर्तितः। हंसो हंस इति प्राणी वारम्वारं जपेत्सदा॥ बहिरागमने हंसः सोहं स्यादन्तरागमे। हंसः सोहं जपो देहे स्वतो नित्यं प्रवर्त्तते॥ षट्शतानि च संख्या स्यात्सहस्राण्येकविंशतिः। जपस्याष्टसु यामेषु नित्यमेव दिने दिने॥ एकान्ते समुपविश्य परेशं हंसविग्रहम्। ध्यायन्नेकाग्रचित्तेन पश्येत्प्राणगति बुधः॥ निर्गमे चप प्रवेशे च हंसः सोहं निरन्तरम्। चेतसा चिन्तयेन्मन्त्र वाचा नोच्चारयेत्क्वचित्॥ एवमभ्यासतो नित्यं जपकोटिर्यदा भवेत्। तदा प्रवर्त्तते नादः स्वयमेव न संशयः॥ (योगगीता 15, 65-74; तुलनीय हंसोपनिषद् एवं दत्तात्रेयसंहिता)