अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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आचार्य-सूत्रधार पूजा निर्णय, वास्तु परिभ्रमणादि गुण-दोष, प्रशस्त मास, प्राची साधन, आय-व्ययादि विचार, मेरु आदि छन्द और विकाश संख्या, विविध प्रकार के गृह, शाल, राजवेश्म, नगरों के प्रमाण, वहाँ निवेश योग्य रचनाओं की विधि, प्राकार के ऊपर स्थापनीय सूर्य यन्त्र, भैरवादि यन्त्र, विविध पुर-कूट-खेटक, ग्रामादि के स्वरूप और जलस्रोतों की रचना का वर्णन ज्ञेय है। इसी प्रकार त्रिविध राजालय, महामण्डलेश्वरादि के राजगृहों के प्रमाण, प्रतोली, एक से लेकर पाँच पोलें, धारागृह, जलयन्त्र, वेद्यशाला, ध्रुवादि षोडश गृह, गृहों के छह प्रकार के छन्द, हवेलियों के गुणदोष, एक से लेकर दशशाल भवन, शुद्धा-सम्बद्धा-संयुता, परिभ्रम चार शालाएँ, छन्दभिन्ना, सम्पुटा, प्रतिक्रम जैसी अन्य शालाएँ, गृहमाला, गृहनाभि, गृहसंघट्ट, गृहाण आदि चार गृह भेद, खण्ड, पाण्डु, वाजिपूर्ण, तृणच्छन्द, पट्टक नामक गृहकर्म षट्च्छन्द, बत्तीस देवताओं के पदानुसार द्वार के शुभाशुभ, राश्यानुसार द्वारमुख और महाराज प्रसादायतन निवेश, राजपुर-ब्रह्मपुर-शूद्रपुर के प्रमाण नामक सूत्रों में मनुष्य वास्तु का विवेचन है। इसी प्रकार देववास्तु के अन्तर्गत त्रैलोक्य दीक्षा का वर्णन, वैराज्यादि पाँच नागर प्रासाद, प्रासादों की संख्या, चौदह प्रकार के प्रासादों की उत्पत्ति, स्वस्तिकादि द्राविड प्रासादों की उत्पत्ति और उनके लक्षण, रुचकादि लतिन प्रासाद के भेद, उनकी उत्पत्ति व संख्या, वराट प्रासाद, विमान प्रासाद, केसरी प्रासाद, मिश्रक प्रासाद, भूमिज प्रासाद, विमान नागर प्रासाद, विमान पुष्पक प्रासाद, वलभी प्रासादों की उत्पत्ति, सिंहावलोकन प्रासाद, दारुज प्रासाद एवं फांसनाकार प्रासादों की उत्पत्ति का वर्णन ज्ञातव्य है। इसी प्रकार नागर-द्राविड-भूमिज-वराट-विमान प्रासादों के लक्षण, मिश्रक-सान्धार-विमाननागरादि प्रासाद और उनके प्रमाण, प्रासाद हर्म्य भेद, द्वार मान, प्रतोली मान, शिवतीर्थोदक का वर्णन, देवता प्रदक्षिणा, जीर्ण वास्तु चालन पर शुभाशुभता, वृष प्रकार दृष्टिस्थान, जीर्णवास्तु गुणदोष, प्रासाद देशानुक्रम, न्यूनाधिक लक्षण, सप्तपुण्याह व उनका माहात्म्य, चौदह शान्तियाँ, चौदह प्रकार की जगती, शिवालय, ब्रह्मालय, विष्णुवालय, सूर्यालय, गौर्यालय, जिनालय के साथ-साथ बलाणक के मान व भेद, भिट्ट का मान व लक्षण, पीठ का मान इत्यादि अनेक विषयों का वर्णन अवलोकनीय है। इसी में कलाओं का विचार बहुत वैज्ञानिक रूप से दिया गया है। प्रासादों के विभिन्न अङ्गों के विवरण सहित यज्ञ-मण्डप विचार, मण्डल विधि, प्रतिष्ठा के लिए रत्नादि न्यास, महोत्सव, प्रासादाङ्गों में देवताओं का न्यास और सात प्रकार के मठों का वर्णन भी ज्ञातव्य है।