अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें208 अपराजितपृच्छा प्रतिष्ठिता शब्दसञ्ज्ञा सप्तमे पञ्चविंशतिः ॥ 26-2 ॥ इसी प्रकार छठे-आठवें घटिक (घड़ियाँ) चौबीस होती है और इन शब्दों के नाम से प्रतिष्ठित सातवीं से पच्चीस होती है। धनर्ऋणकल्पनाह - धनं चैव ऋणं वापि कल्पयेच्छब्दमर्थतः । धने धनं प्रयोज्यं स्यान् मिश्रयेच्च ऋणे ऋणम् ॥ 27 ॥ धन से और ऋण से भी शब्द और अर्थ साथ-साथ कल्पित करें। धन में धन को जोड़ें और ऋण में ऋण का मिश्रण करें। तिथिः सदा ऋणं प्रोक्ता वारघट्यः सदा धनम् । यह ज्ञातव्य है कि तिथि को सदा ऋण ही कहा है और वार तथा घटियाँ सदा ही धन के रूप में कही गई है। स्यात् कर्कटाभिधमृणं धनं मकरराशिकम् ॥ 28 ॥ कर्क राशि नाम से ऋण हैं और मकर राशि धन स्वरूप है। धनवृद्धिस्तिथिभुक्त्वा ऋणवृद्धिरशोधिता । शेषाख्याता तिथिभुक्तिरन्या वारेषु भाषिता ॥ 29 ॥ भुक्ता तिथि को धनवृद्धि होती है और ऋणि वृद्धि अशोधित होती है। शेष सभी तिथि भुक्ति नाम से और अन्य वारों से कही गई हैं। धनाधिकेषु वारेषु तिथिभुक्तिरनुक्रमात् । यदा षष्ठे धनाक्रान्तिर्वारवृद्धिस्तु भाषिता ॥ 30 ॥ वारों में धन अधिक होने से तिथि भुक्ति के अनुक्रम से यदि छठे में धन की क्रान्ति हो तो वारवृद्धि कही जाती है। तिथिसंयोगभुक्ती च प्रयुक्ता विश्वकर्मणा। तिथित्रयादिनक्षत्रं महापर्व च तत्स्मृतम् ॥ 31 ॥ तिथि के संयोग से भुक्ति को विश्वकर्मा ने प्रयुक्त किया है। तीन तिथियों आदि से नक्षत्र को महापर्व कहा गया है। तिथित्रयादि वारादि नक्षत्रत्रयकं विदुः ? । तिथित्रयं चैकवारे तद्वै तिथित्रयाभिधम् ॥ 32 ॥ एवमादिगुणोपेते भुक्त्यृद्धी तिथिवारयोः । तीन तिथियों और वारादि को नक्षत्रत्रय समझें। तीन तिथि और एक वार को