अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें210 अपराजितपृच्छा वेदा दिशाश्च विषया मालाश्चैवाग्निभास्कराः ?। ऋषयश्च तथादित्या अग्रयश्चर्त्विजश्चपरसम्मति- इदमपत्योरिवजश्रं वेदरोस्थलोचनाश्च ? ॥ ३९ ॥ वेद (4), दिशा (10), विषय (5), माला (?), अग्नि (3), भास्कर (12), ऋषि (7), आदित्य (12), अग्नि (3), ऋतु (6) चपर सम्मति इदमपत्यो रिवजश्र वेद (4), उदरस्थ लोचना (2)? (आशय अस्पष्ट है)। सरदिसा₉ रसमादिनी₁₀ सत्यरजात्माश्च₁₁ विन्दिमासश्रदंशब्दार्थ- .आद्योतो पूर्वार्द्धं कटिकोत्तमौधिकारो यत्र नं रणि वोषं धनं प्रकीर्तितम् ॥ ४० ॥ सरदि (9), रसमादिनी (10), सत्यरजात्मा (11) को मास के अर्थ अंशों को शब्दों से जाने। आदि से पूर्वार्द्ध तक कटिकोत्तमो अधिकार जहाँ हो, उसे नरणिबोष (?) धन कहा गया है। पूर्वा ध्रुवकं साध्यमानं च ... घो पुनः साधयेत् ?। वर्णे वर्षे क्षिपेत्तार घटिकौ दशपञ्चाधिकम् ? ॥ ४१ ॥ पूर्वा को ध्रुवक साध्य मान करके पुनः साधन करें। तदोपरान्त वर्ण में वर्ष में चार को रखें तथा घड़ियों को 15 अधिक रखें। शब्दार्थं च क्षिपेद्वारं सप्तभिर्भागमाहरेत्। यच्छेषं लभ्यते वारः सङ्क्रान्तावेव भाषितम् ॥ ४३ ॥ शब्दार्थ के साथ वार को रखें और उसमें सात का भाग देकर आहरण करें जो शेष बचें, उसे वार समझना चाहिए। इस प्रकार से संक्रान्तियों को कहा गया है। ऋणं वाऽपि धनं वाऽपि घटिका मध्यतः क्षिपेत्। भुक्तिः ख्याता ऋणे त्यक्ते धनमिश्रे च सोत्तमा ॥ ४४ ॥ इति सङ्क्रान्तिवर्त्तमानाधिकारः। ऋण हो अथवा धन हो, घटियों को मध्य में रखें। ऋण छोड़ने को भुक्ति कहते हैं और धन को जोड़ने से उत्तमा कहा जाता है। दिननक्षत्राधिकारः — उदयार्धे घटिकायाः पञ्चचत्वारिंशत्तमाः ?। अभ्रमध्ये भवेत्तारा शेषं वै पूर्ववत्क्रमात् ॥ ४५ ॥