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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 535 में से

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xxvii इससे यह भी प्रतीत होता है कि यह ग्रन्थ रचनाकाल के बाद पुनर्संस्कारित या पुनर्सम्पादित हुआ है क्योंकि श्लोकों के बीच-बीच भी अन्य पङ्क्तियाँ मिलती हैं और पाठ भेद भी है। इसके अतिरिक्त भुवनदेव ने शिवरात्रि का विस्तृत वर्णन किया है, वर्ष की सभी शिवरात्रियों का नामोल्लेख किया है। उसके काल में शिवरात्रि का महत्व इस बात से भी प्रतीत होता है कि किराडू-जोधपुर के 1152 ई. के एक अभिलेख में कुमारपाल के एक सामन्त आह्लणदेव द्वारा एक आज्ञा से शिवरात्रि पर पशुवध निषेध करने का निर्देश दिया गया है। (एन्यूअल रिपोर्ट ऑफ राजपूताना म्यूजियम 1931) हमें याद रखना चाहिए कि शिवरात्रि के व्रत की कथा आबू से जुड़ी हुई है और उस कथा में मूलतः शिकारी द्वारा मृग-मृगी का वध नहीं करने का वर्णन ही है। ग्रन्थ के साङ्गोपाङ्ग अध्ययन से प्रतीत होता है कि भुवनदेव जितना गुजरात से परिचित था, उतना ही वह गुजरात से लगे मेवाड़ क्षेत्र से भी परिचित था। बहुत सम्भव है कि वह सोमपुरा हो किन्तु बहुत विद्वान था। वह कुमारपाल के साथ मेवाड़ आया हो जैसा कि कुमारपाल के साथ दण्डपाल सज्जन भी आया था जिसे पाटी सहित चित्तौड़ दिया और वहाँ का राजा किया (जैसा कि कुमारपालदेव प्रबन्ध गाथा 14 में आया है) अथवा भुवनदेव मेवाड़ में उस काल में चल रही शिल्प गतिविधियों के क्रम में निमन्त्रण पर आया हो किन्तु जब परमारों के प्रभाव से मेवाड़ में समराङ्गणसूत्रधार जैसे ग्रन्थ प्रचलित रहे होंगे तो ऐसे में अपराजितपृच्छा जैसे ग्रन्थ की क्या आवश्यकता रही होगी ? ऐसे में कुछ कारण दिखाई देते हैं -

  1. प्रथमतः चालुक्यों का परमार भोज के साथ वैर-भाव था। भोज के पूर्वजों ने गुजरात पर अधिकार के लिए चढ़ाई की थी और वहाँ पर्याप्त रक्तपात हुआ था। इसके बदले में चालुक्यों ने भोज की राजधानी को रौंद डाला था, जैसा कि विक्रमाङ्कदेवचरित (अध्याय प्रथम) आदि से विदित होता है। ऐसे में चालुक्य नहीं चाहते थे कि वे परमार शासकों के किसी मत को स्वीकार करें। ग्रन्थों और विचारधारा के प्रसङ्ग में यह विचार कुछ अधिक ही चरितार्थ होता है। इसलिए भुवनदेव ने भोजकृत समराङ्गणसूत्रधार के श्लोकों को ज्यों-का-त्यों लिया भी है किन्तु कहीं भी भोज का नामोल्लेख नहीं किया है बल्कि उन्हें विश्वकर्मा-वचन कहा है।
  2. द्वितीयतः समराङ्गणसूत्रधार के निर्देश लगभग एक सदी पुराने हो चुके थे और कला में नवीनता देना अपरिहार्य हो चुका था। फिर मालवा व गुजरात में