अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 535 में से
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भूपरीक्षाग्रहपूजा नामाष्टचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 48 ॥ विश्वकर्मोवाच। ग्रहणयोग्यपर्वताश्रितभूप्रदेशमाह — महेन्द्रो मलयश्चैव सिंहश्च विक्रमस्तथा। समुद्रः पारिजातश्च श्रीशैलश्च तथार्बुदः ॥ 1 ॥ नीलश्च श्वेतशृङ्गश्च चन्द्रः प्रभाससम्भवः। गन्धमादनोजयन्तौ प्राप्ता श्वेतसम्भवः ? ॥ 2 ॥ विश्वकर्मा बोले कि पर्वतों में (1.) महेन्द्र, (2.) मलय, (3.) सिंह, (4.) विक्रम, (5.) समुद्र, (6.) पारिजात, (7.) श्रीशैल, (8.) अर्बुद, (9.) नील, (10.) श्वेतशृङ्ग, (11.) चन्द्र, (12.) प्रभाससम्भव, (13.) गन्धमादन और (14.) जयन्त— ये श्वेत से उत्पन्न हुए हैं। (इनके क्षेत्रों को ग्रहण की दृष्टि से विचारणीय जानना चाहिए।) गङ्गाया यमुनायाश्च नर्मदायास्तटे तथा। गोदावर्याः सरस्वत्याः सिन्धौ पृष्ठे तथैव च ॥ 3 ॥ तापी मही तुङ्गभद्रा कावेरी चन्द्रभागिका। पयस्वती साभ्रमती कृष्णा नीरा च निर्मला ॥ 4 ॥ भीमाक्षी सिंहिका ख्याता नीलोद्भवा च वेत्रकी। रेवती मधुरा ख्याता विश्वामित्री च मूलका ॥ 5 ॥ (ग्रहणयोग्य नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों के विषय में कहा जा रहा है) गङ्गा के, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, सरस्वती, सिन्धु, तापी, मही, तुङ्गभद्रा, कावेरी, चन्द्रभागा, पयस्वती, साबरमती, कृष्णा, नीरा, निर्मला, भीमाक्षी, सिंहिका, नीलोद्भवा व वेत्रकी के, रेवती, मधुरा नाम से विख्यात विश्वामित्री और मूलका (के क्षेत्र परीक्षण के योग्य हैं।) नद्यादीनां भूक्षेत्रं — कुरुक्षेत्रे च गङ्गायामन्वेद्यां तथैव च। नैमिषे कुब्जाम्रकेषु महाकालवने तथा ॥ 6 ॥ सिद्धायतनतीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च। उर्वरीषु श्मशानेषु चत्वरे उदकाश्रिते ॥ 7 ॥ सुपदेशे शुभ रम्ये गह्वरे गिरिमाश्रिते। वने चोपवने चैव यत्र वा रोचते मनः ॥ 8 ॥