भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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XXX सुनता है? महल बनाने वाला राजा, देवालय बनाने वाला स्थपति, मठ बनाने वाला यति, मूर्ति तैयार करने वाला रूपाङ्कनकर्ता, भित्ति की चुनाई करता चेजारा, रूई की पिंजाई करने वाला पिंजारा, गाने वाला गायक, नाचने वाला नर्तक, कटार-तलवार, भाला चलाने वाला शूरवीर, शृङ्गार करने वाली दुल्हन, भावाविष्ट होकर देवाराधना करने वाला भोपा सुनता है। यदि भवन सुधर जाता है तो भव (संसार) सुधर जाता है। भजन-भाव सफल-सार्थक हो जाते हैं। विश्वकर्माजी से अपराजित की ज्ञान- सन्तानों (मानसपुत्रों) का यह ज्ञान है। इस प्रकार शिल्प सबद पूर्ण हुआ। अनन्त करोड़ सिद्धों के बीच विराजित गुरु महाराज ने इसे कहा है। सांई का सलाम, गुरुदेव का प्रणाम, नाथजी को आदेश, सभी सन्तों से कहना हरे-हर। इस ग्रन्थ के मेवाड़ में रचित होने के कई प्रमाण इसी में अन्तःसाक्ष्य के रूप में प्राप्त होते हैं जिनको यथास्थान पाद टिप्पणियों के रूप में दिया गया है। इसको अपराजित के नाम लिखने के मूल में यह कारण स्पष्ट होता है कि मेवाड़ को शिल्पधाम के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय गुहिल वंशी अपराजित को ही दिया जाता है। प्रो. डी. आर. भाण्डारकर (इपिग्राफिया इण्डिका जिल्द 39, पृष्ठ 190), कविराजा श्यामलदास (वीरविनोद भाग 1, पृष्ठ 252) आदि इतिहासकारों ने मेवाड़ के गुहिल राजवंश के राजा शील या शीलादित्य (शिलालेख 646 ई.) के पुत्र के रूप में अपराजित (शिलालेख 661 ई.) को परिगणित किगा है। यद्यपि बापा रावल का आद्य-पुरुष के रूप में नाम लिया जाता है किन्तु इतिहासविदों में यह विवाद ही है कि बापा किसी का नाम है अथवा विरुद? क्योंकि कई प्राचीन शिलालेखों में बापा, बाष्प, बप्प आदि नामाभिधानों का प्रयोग हुआ है। (नागरी प्रचारिणी पत्रिका भाग 1, पृष्ठ 248-50 एवं टिप्पणियाँ) इसी प्रकार कुम्भलगढ़ की महाराणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) प्रशस्ति में आया है- तस्मिन् गुहिलवंशेऽभूद्भोजनामावनीश्वरः । तस्मान्महीन्द्रनागाह्नो बप्पाख्यश्चापराजितः ॥ (श्लोक 139) यहाँ बप्पा नाम वाले राजा के बाद अपराजित का वर्णन आया है, ऐसे में शीलादित्य का नाम बप्पा होने का मत कर्नल जेम्स टॉड ने प्रतिपादित किया। (कर्नल जेम्स टॉड जिल्द 1, पृष्ठ 259-69) किन्तु, शीलादित्य के सामोली अभिलेख (643 ई.) में उसके लिए यह अपर नामाभिधान नहीं आया है, इसी आधार पर इतिहासकार गौरीशङ्कर ओझा ने इस तर्क को निर्मूल कह दिया। (उदयपुर राज्य का इतिहास, पृष्ठ 104), तथापि यहाँ यह अवश्य हो सकता है कि अपराजित का यह अपरनाम रहा हो; चूंकि एकलिंग माहात्म्य के आधार पर बप्पा रावल का समय 734-753 ई. का