अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४ 23 सातश्च ? सप्तमां यान्ति क्रमेणापि सुसंस्थिताः । क्षारार्णवक्रमेणैव संस्थिताः सप्त सागराः ॥ २१ ॥ यह जम्बूद्वीप एक लाख योजन का है। इसके बाद ये सात सृष्टियों में बने समुद्र आते हैं। ये सातों ही समुद्र सातवें तक क्रमवार सुसंस्थित है और क्षारार्णव (लवणसागर) के क्रम से ये सातों सागर संस्थित है। सागरान्ते भवेद् द्वीपो द्वीपान्ते चैव सागरः । समुद्राः संस्थिताः सर्वे नगरान्तेषु च विश्रुताः ॥ २३ ॥ अयुतायुतयोजनाः पृथगेकैकसागराः । विपुलागाधगम्भीरा आवर्तबहुलाकुलाः ॥ २४ ॥ इन सागरों के अन्त में अन्य द्वीप होते हैं और उन द्वीपों के अन्त में अन्य सागर होते हैं। ये समुद्र इसी प्रकार एक दूसरे के बाद स्थित है जैसे किसीनगर के बाद दूसरा नगर स्थित होता है। पृथक्-पृथक् ये सागर अयुतायुत योजनों अर्थात् अरबों योजन के विस्तार में विस्तृत हैं और एक दूसरे से अलग-अलग भी हैं। ये सभी सागर बहुत बड़े, बहुत गहरे, बहुत गम्भीर और बहुत ही भ्रमरियों युक्त उत्ताल लहरों से आकुल-व्याकुल रहते हैं। सागरनामानि — क्षारः क्षीरोदधिः सर्पिमधुरिक्षुरसोदकः । समुद्राः सप्तधेत्युक्ताः सन्ति विष्णुसमुद्भवाः ॥ २५ ॥ (इन सागरों के नाम हैं—) (1.) क्षार, (2.) क्षीरोद, (3.) दधि, (4.) सर्पि, (5.) मधु, (6.) इक्षु, (7.) रसोदक। ये सातों ही समुद्र भगवान् विष्णु द्वारा रचित है। कुलादीनां शैलनामानि — नैकशैला कुलारम्या पृथ्वी च द्वीपसागराः । पृथुमानाः स्थिराः सर्वे शम्भोश्चाऽथ समुद्भवः ? ॥ २६ ॥ इस पृथ्वी पर अनेकों प्रकार के रम्य पहाड़ों के कुल समूह, द्वीप, सागर विशाल प्रमाणयुक्त और स्थित है। ये सभी शम्भु की रचना हैं। मेरुश्च मन्दरश्चैव तृतीयो गन्धमादनः । हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नील एव च ॥ २७ ॥ श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव जाता अन्ये कुलाचलाः ।