भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 109 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 12

६ ) अपरोक्षानुभूतिः । विवेकादिक्रमेण हेतुहेतुमद्भावस्तथापि वैराग्यस्या- साधारणकारणतां द्योतयितुमादौ ग्रहणं कृतमिति बोद्धव्यम् ॥ ३ ॥ भा. टी. अपने २ वर्णका धर्म धारण करनेसे अर्थात् ब्राह्म- णोंको पढना पढाना यज्ञकरना यज्ञकराना दानलेना दान देना इन ६ छः कर्मोंकरके क्षत्रियको प्रजापालन करनेसे वैश्यको खेतीका कर्म करनेसे शूद्रको ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यकी सेवा करनेसे और आश्रमधर्म धारण करनेसे अर्थात् ब्रह्मचर्य्य- अवस्थामें गुरुसेवन करनेसे गृहस्थ अवस्थामें पुत्र उत्पन्न करनेसे वानप्रस्थ अवस्थामें स्त्रीसहित तथा इकल्ला जाकर ब्रह्मचर्य धारणकर अग्निहोत्रादि कर्म्म तथा ईश्वरकी आरा- धना करनेसे सन्यस्त अवस्थामें सर्व कर्म्म त्याग करनेसे और चान्द्रायणादि व्रत करनेसे हरिकीर्त्तनकर ईश्वरको प्रसन्न करनेसे मनुष्यको वैराग्य, नित्य अनित्य वस्तुका विवेक,

  • शम दम आदि सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व, यह चार साधन प्राप्त होय हैं ॥ ३ ॥ ( वैराग्यस्वरूप ) ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु वैराग्यं विषये- ष्वनु ॥ यथैव काकविष्ठायां वैराग्यं: तद्धि निर्मलम् ॥ ४ ॥