भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( २२ ) अपरोक्षानुभूतिः। भा. टी. आत्मा नित्यहै अर्थात् आदि मध्य अन्त करके रहितहै, इसी कारण सद्रूप है अर्थात् सदा एकरस रहे है और देह अनित्य है अर्थात् उत्पन्नहोय है, बालक होयहै, युवा होय है, वृद्धहोयहै, रोगी होयहै, सुखदुःख करके ग्रसित रहै है और असत् है अर्थात् नाशवान् है तौभी संसारी पुरुष देह और आत्माकी समता कर व्यवहारकरे हैं इससे अधिक और क्या अज्ञान होगा ॥ २१ ॥ आत्मनस्तत्प्रकाशत्वं यत्पदार्थाव- भासनम् ॥ नाग्न्यादिदीप्तिवद्दीप्तिर्भ- वत्यान्ध्यं यतो निशि ॥ २२ ॥ सं. टी. नन्वात्मनः प्रकाशत्वं किं नामेत्यत आह आत्मनइति आत्मनस्तत् प्रकाशत्वं बोद्धव्यं किंतदि- त्यतआह यदिति यत्पदार्थावभासनं घटपटादिवस्तुवि- षयप्रकाश इदंतया निर्दिश्यमानविषयदर्शनमिति या वत् । तर्ह्यग्न्यादिप्रकाशवद्विकारित्वं स्यादित्यतआह नाग्न्यादिदीप्तिवद्दीप्तिरिति इयमात्मदीप्तिरग्न्यादिदी- प्तिवन्न कदाचिदुत्पत्तिविनाशादिविकारवतीत्यर्थः तत्र हेतुमाह भवतीति भवत्यांध्यं यतो निशि यतःकारणा- न्निशि रात्रावग्न्यादिप्रकाश एकस्मिन्देशेसत्यपितदन्य- त्रलोकस्यांध्यं रूपग्रहणाक्षमत्वं भवति नैतादृश्यात्मदी- प्तिरेकत्र विद्यमाना चैकत्राऽविद्यमाना परिच्छिन्ना चास्ति

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