अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५४ ) अपरोक्षानुभूतिः । सं. टी. ननु “ यत्र हि द्वैतमिव भवति ” इत्यादि श्रुत्यर्थदर्शनेनावस्थात्रये विदेहमोक्षावुक्तौ नतु जी- वन्मोक्ष इत्याशंक्याहः सर्वइति सर्वोऽपि लौकिको वैदिक- श्चेति शेषंस्पष्टम्, अयं भावः अज्ञानानिवृत्तिरेवं जीवन्मु- क्तिर्नतु द्वैतादर्शनमिति ॥ ६५ ॥ भा. टी. लोककी जीवन्मोक्षअवस्था दिखावें हैं क्यों कि (“यत्र हि द्वैतमिव भवति”) जिसमें ज्ञान होनेपर द्वैतकेसा व्यवहार किया जायहै वह जीवन्मोक्ष विदेह 'मोक्ष' से विल- क्षण तीसरी अवस्था कहलावैहै तिस जीवन्मोक्ष अवस्थामें सब लोक परब्रह्मके नियमानुसार सब प्रकार लौकिक और वैदिक कार्य्य करै है ऐसाहै संसारी पुरुष तबभी अज्ञानवशसे कोईभी ब्रह्मको जाननेको समर्थ नहीं होयहै जैसे यद्यपि घट मृत्ति- काही है तथापि मृत्तिका कहनेको समर्थ नहीं होयहै आशय यहहै कि लोक यह नहीं जाने है कि लोकव्यवहारकेही कारण द्वैत व्यवहार किया जायहै वस्तुतः अज्ञानकी निवृत्तिका नाम ज्ञान है और लोकव्यवहारमेंभी अद्वैत व्यवहार करनेका नाम ज्ञान नहीं है ॥ ६५ ॥ कार्यकारणतानित्यमास्ते घटमृदोर्य- था ॥ तथैवश्रुतियुक्तिभ्यां प्रपंचब्रह्म- णोरिह ॥ ६६ ॥ सं. टी. तत्रहेतुं सदृष्टांतमाह कार्येति, “यथा सौम्यै-