आपस्तम्ब धर्मसूत्र (महर्षि आपस्तम्ब - हरदत्त टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आपस्तम्ब धर्मसूत्र (महर्षि आपस्तम्ब - हरदत्त टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Apastamba Dharmasutra with Hindi Commentary
महर्षि आपस्तम्ब / हरदत्त टीका द्वारा
DevanagariSanskritpublished399 पृष्ठ
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८ ग्रन्थान्तरीयवाक्यानां
| पृ० | पं० | पृ० | पं० | ||
|---|---|---|---|---|---|
| क्षीयन्ते चाऽस्य कर्माणि | ,, | २० | उत्पद्यते गृहे यस्य | २३७ | १२ |
| यथैधांसि समिद्धोऽग्निः | २७२ | ११ | उद्धृते दक्षिणे पाणौ | ८३ | १३ |
| भट्टपादः— | उपाकर्मणि चोत्सर्गो | ५६ | ९ | ||
| श्रेयो हि पुरुषप्रीतिः | २ | २७ | उभयत्र दशाहानि | ,, | १३ |
| भार्गवः— | ऊर्ध्वं नाभेः करौ मुक्त्वा | ८७ | ३ | ||
| अशीतिर्यस्य वर्षाणि | १४९ | ६ | ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य | २७० | ९ |
| भारद्वाजसूत्रम्— | ऋतुस्स्वाभाविकस्त्रीणां | १८१ | ७ | ||
| अथ यद्यनाहिताग्निः | २२० | १९ | एतदेव चरेदब्दं | १४१ | १ |
| मनुः— | एतदेव तं कृत्स्नं | १४१ | ३ | ||
| अकामतस्तु राजन्यं | १४० | २० | एतास्तिस्रस्तु भार्यार्थे | २२२ | १९ |
| अजा गावो महिष्यश्च | ८३ | १९ | एवञ्चरति यो विप्रः | २६९ | १७ |
| अत्राऽस्य माता सावित्री | ७ | १७ | एष वै प्रथमः कल्पः | २५३ | २५ |
| अनिर्दशाया गोः क्षीरं | ९८ | १३ | एषु त्वविद्यमानेषु | २६९ | १५ |
| अनिन्दिया अदायादाः | २३९ | २७ | कर्णश्रवेऽनिले रात्रौ | ६१ | २७ |
| अनुमन्ता विशसिता | १०१ | ३ | कार्पासमुपवीतं स्यात् | ८३ | १२ |
| अनुपघ्नन्पितृद्रव्यं | २३८ | ३१ | ,, | १९४ | ९ |
| अनृतञ्चसमुत्कर्षं | १४८ | ८ | काममुत्पाद्य कुष्यान्तु | ११५ | २२ |
| अनंशौ क्लीबपतितौ | २३३ | ८ | क्रीणीयाद्यस्त्वपत्यार्थे | २३७ | १९ |
| अपशस्त्रं विषं मांसं | ११५ | १२ | क्रुध्यन्तन्न प्रतिक्रुध्येत | २७२ | १९ |
| अमावास्याचतुर्दश्योः | ५५ | ७ | गुरुवद्गुरुपत्नीषु | ४४ | ३ |
| अमावास्यामष्टमीं च | १८१ | ११ | गौडी पैष्टी च माध्वी च | ९७ | २५ |
| अवकीर्णी तु काणेन | १५० | ९ | ,, | ११७ | २३ |
| असपिण्डा च या मातुः | २२० | २९ | ,, | १४५ | ,, |
| आचार्ये तु खलु | २६९ | १३ | चण्डालात्त्यस्त्रियो गत्वा | १५७ | ७ |
| आत्मनश्च परित्राणे | १६१ | १३ | जनन्यां संस्थितायान्तु | २३४ | २६ |
| आपश्शुद्धा भूमिगताः | ८३ | १६ | जीवितात्ययमापन्नः | ११६ | २५ |
| आयुष्मान्भव सौम्येति | ३३ | ५ | तद्धि सत्याद्विशिष्यते | २७१ | २६ |
| आयुष्यं प्राङ्मुखो भुंक्ते | १६८ | १९ | तासामाद्याश्चतस्रस्तु | १८१ | ९ |
| आरण्यांश्च पशून् सर्वान् | ११५ | १४ | तृणानि भूमिरुदकं | १९२ | २७ |
| आहैव स नखाग्रेभ्यः | ६७ | १३ | त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः | ५ | २४ |
| इत्तरेषु च शिष्टेषु | २१४ | २३ | त्र्यब्दं चरेद्वा नियतः | १४० | २२ |
| त्यजेदाश्वयुजे मासि | २७६ | २४ |