भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 84 में से

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दीपिकाटीकासहितः । ७ शाब्दी भावनाका साध्य आर्थी भावना ही है क्यों कि शाब्दी भावना और आर्थी भावना दोनों एक ही लिङ् प्रत्ययका अर्थ है इस लिये इन दोनोंका ( समाना- भिधानश्रुतेः ) एक ही वाचक पद होनेसे परस्पर सम्बन्ध होना उचित है । यद्यपि लिङ्वाच्य संख्या और कालभी एक प्रत्यय गम्य हैं तथापि वे दोनों शाब्दी भावना- के साध्य नहीं हो सकते हैं । क्यों कि उन दोनोंमें पुरुषार्थत्व अथवा पुरुषार्थ- साधनत्व नहीं है । इस लिये पुरुषार्थत्व अथवा तत्साधनत्व रूप साध्यत्व-योग्यता नहीं रहनेसे अन्वय नहीं हुआ । प्रवृत्तिरूप आर्थी भावनामें पुरुषार्थ ( धर्मादि ) साधनत्वरूपयोग्यता है इस लिये आर्थीभावनाको साध्यत्वेन अन्वय हो सकता है । साधनाकाङ्क्षायां लिङादिज्ञानं करणत्वेनान्वेति । तस्य च करणत्वं न भावनोत्पादकत्वेन, तत्पूर्वमपि तस्याः शब्दे सत्त्वात् । किंतु भावनाज्ञापक- त्वेन शब्दभावनाभाव्यनिर्वर्तकत्वेन वा । जब शाब्दी भावनामें साधन (करण) की आकांक्षा होती है तब लिङादि ज्ञान- का करणत्वेन अन्वय होता है । यद्यपि लिङादि ज्ञानमें शाब्दीभावनोत्पादकत्वेन कर- णत्व नहीं है, अर्थात् शाब्दीभावनोत्पत्तिजनक लिङादि ज्ञान नहीं है इसलिये लिङादि ज्ञानमें करणता नहीं है क्योंकि ( तत्पूर्वमपि ) लिङादि ज्ञानसे पहले भी शब्दमें (सा) शाब्दी भावना है अतः शाब्दी भावनाका उत्पादक लिङादि ज्ञान कथमपि नहीं हो सकता तथापि ( भावनाज्ञापकत्वेन ) भावनाका प्रकाशक होनेसे लिङादि ज्ञानमें करणत्व माना गया है। अथवा शाब्दी भावनाके (भाव्य) साध्य जो आर्थी- भावना ( तन्निर्वर्तकत्वेन ) उसका सम्पादक होनेसे ही करणता मानी गयी है । जैसे छिदिक्रियासाध्य-द्विधाभवनसम्पादकत्वेन कुठारको छिदि भावनाके प्रति करणत्व होता है उसी तरह प्रकृत में भी समझना चाहिए । इतिकर्तव्यताकाङ्क्षायामर्थवादज्ञाप्यप्राशस्त्यमितिकर्तव्यतात्वेनान्वेति । अभी तकके प्रतिपादनसे यह प्रश्न उठता है कि पुरुषोंकी यागादिमें प्रवृत्ति यदि लिङादि ज्ञानसे होती है तो सबोंकी प्रवृत्ति क्यों नहीं होती इसलिये इतिकर्तव्यता (कैसे यागादि करे) का उत्थान करते हैं कि लिङादि ज्ञानसे कैसे भावना की जाय । इतिकर्तव्यताशब्दमें इतिशब्दका प्रकार अर्थ है । (कर्तव्यस्य इति=प्रकारः इति- कर्तव्यता ) सामान्यका भेदक जो विशेष उसीको प्रकार कहते हैं अतः लिङादि ज्ञानरूप कर्तव्य सामान्य है उसका भेदक जो कर्म-प्राशस्त्य रूप विशेष है उसीको इति कर्तव्यतात्वेन अन्वय होगा । अर्थात् जिसको यागादि कर्ममें प्राशस्त्यका ज्ञान

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