भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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पृष्ठ 7

॥ श्रीः ॥ अर्थसंग्रहः 'दीपिका' टीकया विभूषितः । । मङ्गलाचरणम् । वासुदेवं रमाकान्तं नत्वा लौगाक्षिभास्करः । कुरुते जैमिनिनये प्रवेशायार्थसंग्रहम् ॥ १ ॥ श्रीरामं जगदीश्वरं प्रभुवरं ध्येयं सदायोगिभि- र्भक्तानन्दकरं प्रणम्य परमानन्दस्वरूपं विभुम् । वैदेहीसहितं हृदा गुरुगिरं ध्यात्वा परां सर्वदा श्रीटाटाम्बरिणा हि कौतुकधिया भाषा शुभा तन्यते ॥ बालानां सुखबोधाय मीमांसापरिशीलने । विदुषां प्रीतये सेयमर्थसंग्रहदीपिका ॥ लौगाक्षिभास्करजी लक्ष्मीरमणरूपी वासुदेवको प्रणामकर वेद-वेदांगको पढ़कर धर्ममें जिज्ञासा करनेवालोंको मीमांसा शास्त्रमें प्रवेशके लिये अर्थसंग्रह नामके ग्रन्थकी रचना करते हैं । मीमांसक लोग ईश्वरको न मानते हुए भी द्रव्यत्यागोद्देश्य विष्णुजीको देवता मानते हैं इसलिये उनका अत्यन्त क्लिष्ट ग्रन्थ रचनाके प्रारम्भमें सकलविघ्ननिवारणार्थ और शिष्यशिक्षार्थ स्मरणादिरूप मंगल करना अनुपयुक्त नहीं है । परमकारुणिक भगवान् जैमिनिने द्वादश अध्या- यमें मीमांसा शास्त्र बनाया है उसीका संक्षेपसे इस ग्रन्थमें प्रतिपादन है इसलिये इस ग्रन्थका अर्थसंग्रह नाम सार्थक है । अनुबन्धचतुष्टयविचार—"सम्बन्धश्चाधिकारी च विषयश्च प्रयोजनम् । विनाऽ- नुबन्धं ग्रन्थादौ मंगलं नैव शस्यते ॥” इत्यादि अभियुक्त वचनोंसे ग्रन्थके आरम्भमें अनुबन्धचतुष्टय अवश्य रहता है इसलिये इस ग्रन्थमें भी अनुबन्धचतुष्टय