अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ अर्थसंग्रहः— क्रियमाणस्तद्धेतुः। ईश्वरार्पणबुद्ध्या क्रियमाणस्तु निःश्रेयसहेतुः। न च तदर्पणबुद्ध्यनुष्ठाने प्रमाणाभावः 'यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्'ति भगवद्गीतास्मृतेरेव प्रमा- णत्वात्। स्मृतिचरणे तत्प्रामाण्यस्य श्रुतिमूलकत्वेन व्यवस्थापनादिति शिवम् ॥ बालानां सुखबोधाय भास्करेण सुमेधसा। रचितोऽयं समासेन जैमिनीयार्थसंग्रहः ॥ १ ॥ इति श्रीमहामहोपाध्याय लौगाक्षिभास्करविरचितपूर्वमीमांसार्थ- संग्रहनामकं प्रकरणं समाप्तिम्गात् ॥ इस तरहसे 'यजेत स्वर्गकामः' इत्यादि सब वेद कोई साक्षात् और कोई परम्परया यागादि रूप धर्मका प्रतिपादक है यह सिद्ध हुआ। यह यागादि रूप धर्म जिस उद्देश्यसे विहित है उस उद्देश्यसे करने पर वह फल अवश्य मिलता है। ईश्वरार्पण बुद्धिसे याग करने पर मोक्ष मिलता है। ईश्वरार्पण बुद्धिसे अनुष्ठान करनेमें कोई प्रमाण नहीं है यह नहीं कह सकते हैं क्योंकि 'यत्क- रोषि' इत्यादि स्मृति ही प्रमाण है। स्मृति वेदमूलक है अतः स्मृति भी प्रमाण है। श्री लौगाक्षिभास्करने बालकोंको अनायाससे बोध हो इसलिए संक्षेपमें यह मीमांसाका अर्थसंग्रह नामक ग्रन्थ बनाया ॥ १ ॥ जयतु श्रीरामः समाप्तश्चायं ग्रन्थः।