आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगौतमीय न्यायशास्त्र सभाष्यानुवाद—मूल्य ३॥) वेद, उपवेद और वेद के छः अङ्गों के रक्षार्थ-हमारे ऋषियों ने-छः उपाङ्ग स्वरूप-छः दर्शन शास्त्र रचे हैं। इन दर्शनों में (अपने २ तरीके पर) वेदोक्त सत्य सनातन धर्म को युक्ति तथा प्रमाणों से बड़े २ नास्तिकों के आक्षेपों का. उत्तर देकर-हमारे वेदोक्त धर्म की रक्षा कियो गयी है। इन छः दर्शनों में से सब से अधिक हमारे गौतम ऋषि ने चार्वाक, बौद्ध, आर्हत, जैन आदि मतों का अकाट्य उत्तर दिया है। इस दर्शन में एक बड़ी विल- क्षणता है कि इस का ठीक २ समझ लेने पर, शास्त्रार्थ वा बहस की रीति खूब मालूम हो जाती है और चाहे कैसा भी प्रबल नास्तिक क्यों न हो इस शास्त्र के जानने वाले के सामने नहीं ठहर सकता। इस न्यायविद्या को "तर्क," मन्तिक़ या Logic कहते हैं। गौतम मुनि कृत ५३० सूत्रों पर वात्स्या- यन मुनिकृत संस्कृत भाष्य का-अत्युस सरलभाषानुवाद, स्थान २ पर उपयुक्त टिप्पणी दियो गयी है। और यह प्रति १३ शुद्ध प्रतियों से मिला कर अत्यन्त शुद्ध छापी गयी है। इस में एक और विशेषता है कि इस की भूमिका में आस्तिक और नास्तिक दर्शनों पर युक्ति और प्रमाणों द्वारा विचार लिखा गया है और-छः दर्शनों का परस्पर विरोधाभास-के भ्रम को दूर किया गया है। अर्थात् छः दर्शन का-मुख्य'एक वेदोक्त सत्यधर्म की रक्षा करना-उद्देश्य है यह बात युक्ति, प्रमाण से सिद्ध कियो गयी है। सामवेदीय-गोभिलगृह्यसूत्र सटीक सानुवाद २॥) वेद के शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, और ज्योतिष इन छः अङ्गों में से-"कल्प" नामक अङ्ग वेद के हस्त स्वरूप हैं। अर्थात् वेद का जो प्रधान उद्देश्य-श्रेयस्कर कर्मकाण्ड की प्रवृत्तिकराने में-है उसी का प्रतिपादक गृह्यसूत्र है। चारों वेदों की भिन्न २ शाखा होने से.प्रत्येक शाखाओं के भिन्न २ गृह्यसूत्र हैं। यह गोभिल गृह्यसूत्र-सामवेद की कौथुमी शाखा का-गोभिल- मुनिप्रणीत-स्मार्तकर्म की पद्धति स्वरूप है। इस ग्रन्थ में प्रथम सूत्र है। प्रत्येक सूत्र पर संस्कृतटीका, आवश्यकीय स्थानों में टिप्पणी और गर्भाधानादि संस्कारों में जिन वेद मन्त्रों के पढ़ने की आवश्यकता पड़ती है, वे पूरे २ मन्त्र संस्कृत टीका में रखे गये हैं। और भूमिका में वेद, शाखा, सूत्र, गोत्र, प्रवर, आदि पर अत्यन्त उपयोगी विचार किया गया है। सुन्दर चिकने कागज पर नये टाइप में, अत्यन्त शुद्ध छपा है। सूर्यसिद्धान्त भाषाटीका और बृहद्भूमिका सहित मू० २) यह ग्रन्थ-सिद्धान्त ज्योतिष के उपलब्ध ग्रन्थों में सब प्राचीन सर्व मान्य है। भारतवर्ष में ज्योतिष के अनुसार पञ्चाङ्ग आदि बनने तथा गणित आदि सिद्धान्त ज्योतिष के विषय सम्बन्धी विवाद होने पर-इसी