आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआर्यभटीये ३ र्गेऽवर्गे । इति । द्विनवकेऽष्टादशके नव स्वराः क्रमेण प्रयुज्यन्ते । अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ । इत्येते नव स्वराः । एतदुक्तं भवति । ककाराद्यक्षर- तास्तस्वरास्स्थानप्रदर्शका भवन्ति न संख्याविशेषप्रदर्शका इति । कथं नव- ोख्यां अष्टादशके प्रयुज्यन्ते । इत्यत्राह । वर्गेऽवर्गे । इति । वर्गस्थानेषु न- स्वकाराद्या नव स्वराः क्रमेण प्रयुज्यन्ते । तथा अवर्गस्थानेषु च त एव । ए- वमन्यैरपि कल्प्यम् । तथा प्रथमस्वरयुतैर्यकारादिभिर्विहिता संख्या प्रथमे प्रवर्गस्थाने स्थाप्या । द्वितीयस्वरयुतैर्द्वितीये अवर्गस्थाने।एवमन्यैरपीति। ए- ामष्टादशस्थानेषु संख्या वेद्या।यदा पुनस्ततोऽधिकापि संख्या केनचिद्विवक्षि- ता तदा कथमित्यत्राह। नवान्त्यवर्गे वा । इति । नवानां वर्गस्थानानामन्त्ये ऊर्ध्वगते वर्गस्थाननवके तथा नवानांमवर्गस्थानानामन्त्ये ऊर्ध्वगते अवर्ग- स्थाननवके च एते नव स्वराः प्रयुज्यन्ते वा । केनचिदनुस्वारादिविशेषेण संयुक्ताः प्रयोक्तव्या इत्यर्थः । शास्त्रव्यवहारस्त्वष्टादशस्थानानि नातिवर्तते ॥ अथ चतुर्युगे रव्यादीनां भगणसंख्यामाह । भा०.- वर्ग के अक्षरों को (क, ख' ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म,) वर्ग के स्थान में एक से अयुत तकको (विषम) स्थान में रख कर संख्या जाननी चाहिये । इसी प्रकार अवर्ग में प्रवर्ग के अक्षर जानना यकारादि (य, र, ल, व, श, ष, स, ह,) अवर्ग के स्था- न में दशसहस्र, लक्ष, आदि को "सम" स्थान में रक्खे। ककारसे लेकरसंख्या माननी अर्थात् क, से १, ख, से, २ ग, से ३ इत्यादि, म, से २५ इसप्रकार क को १ सं- ख्या मानकर म पर्यन्तक्रमशः २५ संख्याहोगी। ङ, और म इन दोनों कीसंख्यां का योग "य' की संख्या है। प्रथम स्थान में य ३० का बोधक, द्वितीय स्थान में ३ का, इसी प्रकार 'र' ४० का बोधक और द्वितीय स्थान में ४ का बोधक है। हकारादि भी इसी प्रकार जानना। यहां ककारादि में जो अकारादि स्व- ः संयुक्त हैं वे संख्या प्रदर्शक नहीं हैं किन्तु स्थान प्रदर्शक हैं। अ, इ, उ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, लृ, ये नव स्वर हैं-तो १८ संख्या स्थानों में नवस्वर दयां कर रक्खे जावेंगे १ वर्ग स्थान में नव स्वर क्रम से प्रयुक्त होते हैं, उसी प्र- कार अवर्ग स्थान में भी वेही नव स्वर हैं। इसी प्रकार औरों का भी जानना प्रथम स्वर युक्त यकारादि द्वारा संख्या कही जावे-उस को पहिले अवर्ग स्था- न में, और द्वितीय स्वर युक्त को द्वितीय अवर्ग स्थान में रखनी । इसी प्र-