अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें४ भाषार्थसहिता ॥
दानंप्रतिग्रहश्चेति षट्कर्माणीतिचोच्यते ॥ १७ ॥
अध्यापनञ्चत्रिविधं धर्म्मार्थमृक्थकारणात् ।
शुश्रूषाकरणंचेति त्रिविधंपरिकीर्तितम् ॥ १८ ॥
एषामन्यतमाभावे वृथाचारोभवेद्विजः ।
तत्रविद्यानदातव्या पुरुषेणहितैषिणा ॥ १९ ॥
योग्यानध्यापयेच्छिष्या=नयोग्यानपिवर्जयेत् ।
विदितात्प्रतिगृह्णीयाद् गृहेधर्मप्रसिद्धये ॥ २० ॥
वेदञ्चैवाभ्यसेन्नित्यं शुचौदेशेसमाहितः ।
धर्म्मशास्त्रंतथापाठ्यंब्राह्मणैःशुद्धमानसैः ॥ २१ ॥
वेदवत्पठितव्यंच श्रोतव्यंचदिवानिशि ।
स्मृतिहीनायविप्राय श्रुतिहीनेतथैवच ॥ २२ ॥
दानंभोजनमन्यच्च दत्तंकुलविनाशनम् ।
संतान रहे वह सुख से बढ़ता है अर्थात् धन पुत्रवान् होता है ॥१६॥वेदका पढ़ाना पढ़ना-द्विजों को यज्ञ कराना और स्वयं यज्ञ करना-सुपात्र को दान देना और प्रतिग्रह (दान) लेना ये छः कर्म कहे हैं ॥१७॥ वेदादिशास्त्र का पढ़ाना भी तीन प्रकार का है १ धर्म के अर्थ २ धन को लेकर और ३ सेवा के लिये ॥ १८ ॥ इन तीनों में से जिस शिष्य में धर्मादि एक भी न हो उस के पढ़ाने से ब्राह्मण वृथाचारी होता है ऐसे शिष्य को अपने हित का अभिलाषी पुरुष विद्या न दे ॥ १९ ॥ योग्य शिष्यों को पढ़ावे और अयोग्यों को वर्जेदे और गृहस्थ धर्म के निर्वाहार्थ प्रसिद्ध पुरुष (धनी) से प्रतिग्रह ले ॥२०॥ शुद्ध देश में सावधान होकर वेदका अभ्यास करे और शुद्ध मनवाले ब्राह्मणों को धर्म शास्त्र भी पढ़ना चाहिये ॥२१॥वेद के समान धर्म शास्त्र को भी प्रतिदिन पढ़ना और सुनना चाहिये, स्मृति नाम धर्मशास्त्र श्रुति वेद इन दोनों से हीन ब्राह्मण को॥२२॥ दान-भोजन-और अन्य जो दिया जाय वह कुलको नष्टकरता है।इस से