भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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६ भाषार्थसहित

सत्यांहितांवदेद्वाचं परलोकाहितैषिणीम् ॥ २९ ॥
एषधर्म्मःसमुद्दिष्टो ब्राह्मणस्यसमासतः ।
धर्ममेवहियःकुर्यात्सयातिब्रह्मणःपदम् ॥ ३० ॥
इत्येषधर्मःकथितोमयायं पृष्टोभवद्भिस्त्वखिलाघहारी ।
वदामिराज्ञामपिचैवधर्म्मान्पृथक्पृथग्बोधतविप्रवर्याः ॥३१॥

इति हारीते धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

क्षत्रादीनांप्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्व्वशः ।
येषुप्रवृत्ताविधिना सर्वेयान्तिपरांगतिम् ॥१॥
राज्यस्थःक्षत्रियश्चापि प्रजाधर्मेणपालयन् ।
कुर्यादध्ययनंसम्यग् यजेद्यज्ञान्यथाविधि ॥२॥
दद्याद्दानंद्विजातिभ्यो धर्मबुद्धिसमन्वितः ।
स्वभार्यानिरतोनित्यं षड्भागार्हःसदानृपः ॥३॥
नीतिशास्त्रार्थकुशलः सन्धिविग्रहतत्त्ववित् ।


पना हित करने वाली वाणी को बोला करे ॥ २९ ॥ यह धर्म ब्राह्मण का संक्षेप से कहा, जो ब्राह्मण धर्म को ही करता है वह ब्रह्मपद को प्राप्त होता है ॥ ३० ॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! जो धर्म तुमने मुझे पूछा था संपूर्ण पापों का ना-शक वह यह धर्म हमने कहा और राजाओं के भी पृथक् २ धर्मों को कहते हैं तुम सुनो ॥ ३१ ॥

इति हारीते धर्म शास्त्रे १ अध्याय भाषा समाप्त।

अब क्षत्रियादि के धर्म को यथार्थ क्रम से हम कहते हैं कि जिन धर्मों को विधि से करते हुए (क्षत्रियादि) परमगति को प्राप्त होते हैं ॥१॥ राज्य पदवी पर स्थित धर्म से प्रजा की रक्षा करता हुआ क्षत्रिय भी वेद पढ़े और विधिपूर्वक यज्ञ करे ॥२॥ जो राजा धर्मानुकूल बुद्धि करके ब्राह्मणों को दान दे और अपनी स्त्री में ही प्रेम रक्खे वेश्यादि से सदा बचे ऐसा राजा सदैव प्रजा से षष्ठांश कर लेने योग्य होता है ॥३॥ नीतिशास्त्र में कुशल और सन्धि

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