भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥

एतदाचरतेयोहि सस्वर्गीनात्रसंशयः ॥१०॥
वर्णत्रयस्यशुश्रूषां कुर्याच्छूद्रःप्रयत्नतः ।
दासवद्ब्राह्मणानाञ्च विशेषेणसमाचरेत् ॥११॥
अयाचितप्रदाताच कष्टंवृत्त्यर्थमाचरेत् ।
पाकयज्ञविधानेन यजेद्देवमतन्द्रितः ॥१२॥
शूद्राणामधिकंकुर्यादर्च्चनंन्यायवर्त्तिनाम् ।
धारणंजीर्णवस्त्रस्य विप्रस्योच्छिष्टभोजनम् ॥ १३ ॥
स्वदारेषुरतिश्चैव परदारविवर्जनम् ।
इत्थंकुर्यात्सदाशूद्रो मनोवाक्कायकर्मभिः ।
स्थानमैन्द्रमवाप्नोति नष्टपापःसुपुण्यकृत् ॥ १४ ॥
वर्णेषुधर्म्माविविधामयोक्ता यथातथाब्रह्ममुखेरिताः पुरा ।
शृणुध्वमत्राश्रमधर्म्ममाद्यं मयोच्यमानंक्रमशोमुनीन्द्राः॥१५॥
इति हारीते धर्म्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥


नहीं ॥ १० ॥ शूद्र के धर्म-तीनों वर्णों की सेवा को शूद्र यत्न से करे और ब्राह्मणों की तो दास बन कर सेवा करे ॥ ११ ॥ बिना मांगे दे और अपने निर्वाहके लिये कष्ट सहे और आलस्य को छोड़ कर पाक यज्ञ से देवताओं का पूजन करे ॥१२॥और न्याय में तत्पर जो शूद्र उनकाभी पूजन अधिकता से करे। पुराने वस्त्रका धारण करे और ब्राह्मण के खाने से शेष बचे भोजन शूद्र करे॥१३॥ अपनी स्त्रियों मेंरमे और पराई स्त्रियोंको बर्जे—मन, वाणी, देह के कर्म से शूद्र इसी प्रकार सदा करे ॥१४॥ नष्ट हुआहै पाप जिसका ऐसा उत्तम पुण्यात्मा शूद्र इंद्र के स्थान को प्राप्त होता है ये ब्रह्मा जी के मुखसे निकले हुए वर्णों के यथार्थ धर्म हमने कहे ॥ १५॥ हे श्रेष्ठ मुनियो अब हमारे कहे आश्रमों के सनातन धर्म को क्रम से सुनो ॥१६॥

इति हारीते धर्मशास्त्रे २ अध्यायः भाषासमाप्ता ॥