अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 805 में से
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भाषार्थसहिता ॥
विप्रो विप्रेण संस्पृष्ट उच्छिष्टेन कदाचन ।
आचांत एव शुद्धेत अंगिरामुनिरब्रवीत् ॥८॥
क्षत्रियेण यदा स्पृष्ट उच्छिष्टेन कदाचन ।
स्नानं जप्यं तु कुर्वीत दिनस्यार्द्धेन शुद्ध्यति ॥९॥
वैश्येन तु यदा स्पृष्टः शुना शूद्रेण वा द्विजः ।
उपोष्य रजनीमेकां पंचगव्येन शुद्ध्यति ॥१०॥
अनुच्छिष्टेन संस्पृष्टः स्नानं येन विधीयते ।
तेनैवोच्छिष्टसंस्पृष्टः प्राजापत्यं समाचरेत् ॥११॥
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि नीलीशौचस्य वै विधिम् ।
स्त्रीणां क्रीडार्थसंभोगे शयनीये न दुष्यति ॥ १२ ॥
पालनं विक्रयश्चैव सद्वृत्त्या उपजीवनम् ।
पतितस्तु भवेद्विप्रस्त्रिभिः कृच्छ्रैर्व्यपोहति ॥ १३ ॥
स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम् ।
स्पृष्ट्वा तस्य महापापं नीलीवस्त्रस्य धारणम् ॥ १४ ॥
ना कभी उच्छिष्ट ब्राह्मण-ब्राह्मण का स्पर्श करले तो आचमन कर के शुद्ध होता है यह अंगिरा मुनि ने कहा है ॥८॥ जो कभी उच्छिष्ट क्षत्रिय ब्राह्मण को स्पर्श करले तो स्नान और जप करता हुआ आधे दिनमें शुद्ध होता है ॥९॥ जो उच्छिष्ट वैश्य शूद्र और कुत्ता, ये तीनों ब्राह्मण को स्पर्श करलें तो एक रात्री भर उपवास करके पंचगव्य पीनेसे शुद्ध होता है ॥१०॥ जिस अनुच्छिष्ट (जूठे मुख न हो) के स्पर्श करनेसे स्नान कहा है उसी उच्छिष्टके स्पर्श करने पर प्राजापत्य व्रतको करे ॥११॥ इनसे आगे नीली (नील) के शौच की विधि कहते हैं—स्त्रियों की क्रीड़ा के अर्थ भोग करने की शय्या पर नीला कपड़ा दूषित नहीं है ॥१२॥ नील का पालना-बेचना और नीलके व्यापार से जीविका करने से ब्राह्मण पतित होता है पुनः तीन कृच्छ्रव्रत करके उस पाप से शुद्ध होता है ॥१३॥ नीलेवस्त्र धारण करने वाले पुरुष का स्पर्श करके जो स्नान दान जप-होम=वेदपाठ-और पितरों का तर्पण करता है उसको महान् (बड़ा) पाप होता है ॥१४॥