अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंअङ्गिरःस्मृतिः ॥ १९
अनपत्या तु या नारी नाश्नीयात्तद्गृहेऽपि वै ॥ ६९ ॥ अथ भुंक्तं तु यो मोहात्पूयसं नरकं व्रजेत् । स्त्रिया धनं तु ये मोहादुपजीवंति मानवाः ॥ ७० ॥ स्त्रिया यानानि वासांसि ते पापा यांत्यधोगतिम् । राज्ञान्नं हरते तेजः शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् ॥ ७१ ॥ सूतकेषु च यो भुंक्ते सभुंक्ते पृथिवीमलम् ॥ सूतकेषु च यो भुंक्ते सभुंक्ते पृथिवीमलम् ॥ ७२ ॥
इत्यंगिरसाप्रणीतं धर्मशास्त्रं संपूर्णम् ॥
चाहिये तथा जो स्त्री बंध्या हो उसके घर भी नहीं खावे ॥ ६९ ॥ तथा मोह से भोजन करता है तो वह पूय (पीब) नरक में जाता है स्त्री के धन से जो मनुष्य मोह से जीते (खाते) हैं ॥ ७० ॥ जो स्त्री का यान (सवारी) वस्त्रों को वर्तते हैं वे पापी अधोगति को प्राप्त होते हैं राजा का अन्न तेज को हरता है और शूद्र का अन्न ब्रह्मतेजको ॥ ७१ ॥ और जो सूतकों में किसी घर भोजन करता है वह पृथिवी के मल को खाता है ॥
इत्यंगिरसाप्रोक्तंधर्मशास्त्रं समाप्तम्