अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२ भाषार्थसहिता ॥
एवंकृतेकथंचित्स्या-त्प्रमादोयद्यक'मतः । गवादीनांततोस्माकं भगवन्ब्रूहिनिष्कृतिम् ॥ ७ ॥ एवमुक्तःक्षणंध्यात्वा प्रणिपातादधोमुखः । दृष्ट्वाऋषीनुवाचेद-मापस्तंबःसुनिश्चितम् ॥ ८ ॥ बालानांस्तनपानादि-कार्येदीषोनविद्यते । विपत्तावपिविप्राणा-मामंत्रणचिकित्सने ॥ ९ ॥ गवादीनांप्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तंतृणादिषु । केचिदाहुर्नदोषोत्र स्नेहेलवणभेषजे ॥ १० ॥ औषधंलवणंचैव स्नेहंपुष्ट्यर्थभोजनम् । प्राणिनांप्राणवृत्यथं प्रायश्चित्तंनविद्यते ॥ ११ ॥ अतिरिक्तं नदातव्यं कालेस्वल्पंतुदापयेत् । अतिरिक्तविपन्नानां कृच्छ्रमेवविधीयते ॥ १२ ॥ त्र्यहंनिरशनंपादः पादश्चायाचितंत्र्यहम् ।
इस प्रकार करते हुए यदि किसी प्रकार अज्ञान से गौ आदिकों का प्रमाद (अपराध) होजाय तो हे भगवन् ! उस से हमारा प्रायश्चित्त कैसे हो यह कहो ॥७॥ इस प्रकार पूछने पर नमस्कार से नीचे को मुखकर-क्षणभर ध्यान करके और ऋषियोंको देखकर आपस्तंब मुनि सम्यक्प्रकार निश्चित बचन बोले ॥८॥ बालकों को दूध पानकराने, और ब्राह्मणों के भोजन कराने, तथा औषध करने में यदि विपत्ति (मरण) भी हो जाय तो दोष नहीं है ॥९॥ गौ आदि के तृण आदि से मरने में प्रायश्चित्त की विधि कहते हैं कई आचार्य यह कहते हैं कि स्नेह ( तेल आदि ) लवण औषध में अर्थात इन के देने से गौ मर-जाय तो दोष नहीं ॥ १० ॥ औषध-लवण-स्नेह-पुष्टि के लिये भोजन-ये यदि प्राणियों की वृत्ति (जीने) के लिये दिये जायं तो इन से मरने में प्रायश्चित्त नहीं है ॥ ११ ॥ इस से भोजन प्रमाण से अधिक न दे किन्तु समय (क्षुधाकाल) पर थोड़ा दे यदि अधिक देने पर कोई प्राणी मरजाय तो कृच्छ्र करना कहा है ॥ १२ ॥ तीन दिन भोजन न करना यह प्रथम पाद-और तीन दिन तक