भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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आपस्तम्बस्मृतिः ॥ १९

अहोरात्रोषिताभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति॥ २० ॥ एवंतुक्षत्रियावैश्या ब्राह्मणीचेद्रजस्वला । सचैलंप्लवनंकृत्वा दिनस्यांतेघृतं पिवेत् ॥ २१ ॥ सवर्णेषुतुनारीणां सद्यःस्नानंविधीयते ॥ एवमेवविशुद्धिःस्या-दापस्तंबोब्रवीन्मुनिः ॥ २२ ॥ इत्यापस्तंबीयेसप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ भस्मनाशुद्ध्यते कांस्यं सुरायान्नन्लिप्यते । सुराविण्मूत्रसंस्पृष्टं शुद्ध्यतेतापलेखनैः ॥ १ ॥ गवाघ्रातानि कांस्यानि शूद्रोच्छिष्टानियानितु । दशभस्मभिःशुद्ध्यन्ति श्वकाकोपहतानिच ॥ २ ॥ शौचं सुवर्णनारीणां वायुसूर्येंदुरश्मिभिः । रेतःस्पृष्टंशवस्पृष्टं मात्रिकंतुप्रदुष्यति ॥ ३ ॥ अद्भिर्मृदाचतन्मात्रं प्रक्षाल्यचविशुद्ध्यति ।


ब्राह्मणी रजस्वला शूद्रा का स्पर्श करले तो एक दिन रात्र उपवास करके पंच- गव्य से शुद्ध होती है ॥ २० ॥ इसी प्रकार क्षत्रिया वैश्या ब्राह्मणीये रजस्वला भी परस्पर एक दूसरी का स्पर्श करले तो सचैल स्नान करके संध्या को घी पीवें ॥ २१ ॥ अपने वर्ण की रजस्वला के छूने में तत्काल ही स्नान कहा है इसी प्रकार शुद्धि होती है यह आपस्तम्ब मुनिने कहा है ॥ २२ ॥

इत्यापस्तम्बीये सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

जिस कांसे के पात्र में मदिरा का स्पर्श न हुआ हो वह भस्म से और जिस से मदिरा विष्ठा मूत्र का स्पर्श हुआ हो वह तपाने और रितवाने से शुद्ध होता है ॥ १ ॥ गौके सूंघे-शूद्र के उच्छिष्ट तथा कुत्ता काक के छुये जो कांसेके पात्र हैं वे दशवार भस्म से मांञने से शुद्ध होते हैं ॥ २ ॥ सोना और स्त्रियों की शुद्धि वायु सूर्य और चन्द्रमा की किरणों से होती है और वीर्य तथा मुर्दा का स्पर्श जिस में हुआ हो ऐसा उनका वस्त्र दूषित (अशुद्ध) है ॥ ३ ॥ परन्तु जल औ र मिट्टी से जितने में वीर्य आदि लगे हों उतने वस्त्र को धोकर सम्यक् प्रकार