अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ भाषार्थसहिता ॥
पूर्व्वमन्थन्त्यवस्थास्ताः प्राच्यग्नेःस्याद्यथाच्युतिः ॥४॥ नैकया विविनाकार्य्यमाधानंभार्य्ययाद्विजैः । अश्रुतंतद्विजानीयात्सर्व्वान्वाचारमन्तियत् ॥५॥ वर्णज्यैष्ठ्येनबह्वीभिः सवर्णाभिश्चजन्मतः । कार्य्यमग्निच्युतेराभिः साध्वीभिर्मन्थनंपुनः ॥६॥ नात्रशूद्रींप्रयुञ्जीत नद्रोहाद्द्वेषकारिणीम् । नचैवाव्रतस्थांनान्यपुंसाचसहसङ्गताम् ॥७॥ ततःशक्ततरापश्चादासामन्यतरापिवा । उपेतानांवान्यतमामन्थेद्ग्निंनिकामतः ॥८॥ जातस्यलक्षणंकृत्वा तंप्रणीयसमिध्यच । आधायसमिधंचैव ब्रह्माणंचोपवेशयेत् ॥९॥ ततःपूर्णाहुतिंहुत्वा सर्वमन्त्रसमन्विताम् । गांदद्याद्यज्ञवानन्ते ब्रह्मणेवाससीतथा ॥१०॥
मथे जिस से अरणी में से पूर्व दिशा में अग्नि निकल के गिरे ॥४॥ ब्राह्मणादि द्विज एक भी पत्नी न हो तो अग्नि का आधान न करे यदि करे तो उस को नहीं किया जाने, जिस से स्त्री सब मनुष्यों को वाणी से वश में करती हैं॥५॥ यदि बहुत स्त्री हों तो जो उत्तम वर्ण हो उस के साथ और यदि उत्तम वर्ण की ही बहुत हों तो जो अवस्था में बड़ी हो उसके साथ अग्नि का आधान करे यदि मथित अग्नि नष्ट होजाय तो सीधे स्वभाव वाली स्त्रियां फिर मन्थन करें ॥६॥ अग्नि के स्थापन में इन स्त्रियों को नियुक्त न करे-शूद्री, क्रोधिनी, लड़ाका, जो किसी नियम में स्थित न हो, और जिस ने अन्य पुरुष का संग किया हो ॥ ७ ॥ फिर उन दो प्रकार की सवर्णा असवर्णा स्त्रियों में जो अत्यन्त समर्थ बलवती हो अथवा एक वर्ण की प्राप्त हुई बहुत स्त्रियों में कोई अवस्था में छोटी भी हो तो वह इच्छापूर्वक अग्नि को मथे ॥८॥ पैदा हुए अग्नि के लक्षण प्रकाश कर अग्निशाला में लाके प्रज्वलित करके और समिधा ढांक की लकड़ी अग्नि में रख के अग्निकुण्ड से दक्षिण में विधिपूर्वक वरण करके ब्रह्मा को बैठावे ॥९॥ फिर पूर्णाहुति के सब मन्त्रों से पूर्णाहुति देकर अन्त में ब्रह्मा को दो वस्त्र और गौ दान देवे ॥१०॥