अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअत्रिस्मृतिः ॥ १२
यमुद्दिश्यनिमज्जेत द्वादशांशफलंभवेत् ॥ ५१ ॥
अपुत्रेणैवकर्तव्यः पुत्रप्रतिनिधिस्सदा ।
पिण्डोदकक्रियाहेतो—र्यस्मात्तस्मात्प्रयत्नतः ॥५२॥
पितापुत्रस्यजातस्य पश्येच्चेज्जीवतोमुखम् ।
ऋणमस्मिन्संनयति अमृतत्वंचगच्छति ॥ ५३ ॥
जातमात्रेणपुत्रेण पितृणामनृणीपिता ।
तदहिशुद्धिमाप्नोति नरकात्त्रायतेहिसः ॥ ५४ ॥
जायन्तेबहवःपुत्रा यद्येकोपिगयांव्रजेत् ।
यजतेचाश्वमेधंच नीलंवावृषमुत्सृजेत् ॥ ५५ ॥
गोता लगावे उसको स्नान के फल का बारहवां भाग मिलता है ॥ ५१ ॥
पुत्र हीन पुरुष को पिण्ड और जलदान के लिये बड़े यत्न से जिस किसी के पुत्र को प्रतिनिधि (दत्तक पुत्र) करना चाहिये ॥ ५२ ॥ जो पैदा हुये जीवित पुत्र के मुख को पिता देख लेवे तो पुत्र को ऋण सौंप कर पिता पितृ-ऋण से छूट जाता है और मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ ५३ ॥ पुत्र के उत्पन्न होने मात्र से ही पिता पितरों का अनृणी हो जाता है और उसी दिन शुद्ध हो जाता है क्योंकि वह पुत्र पिता को नरक से रक्षा करता है ॥ ५४ ॥ उत्पन्न हुये बहुत पुत्रों में से यदि एक पुत्र भी गया जी को जाय अथवा नीले बैल से वृषोत्सर्ग करे वह मानों अश्वमेध यज्ञ करता है ॥ ५५ ॥
वि०:— (५२) श्राद्ध तर्पण का सिल सिला चला जाना शास्त्रकारों के सिद्धान्ता-नुसार ऐसा ही आवश्यक है जैसा कि मनुष्य के लिये नित्य २ अन्न जल अपेक्षित है (५३ : ५४) पुत् नाम नरक से पिता की त्राण (रक्षा) करने वाला होने से ही मनु जी ने उस का सार्थकनाम पुत्र रक्खा है। जैसे राजकुमार के उत्पन्न होते ही भविष्यत् में राजकार्य चलाने की आशा सब को हो जाती राज कार्यों का भार रूप ऋण उसी दिन से उस पर आजाता है वैसा यहां भी जानो। (५५) अच्छे काम भी किसी खास स्थान में जैसे उत्तम होते हैं वैसे सर्वत्र नहीं हो सक्ते जैसे संस्कृत के सार्वभौम पण्डित काशी में ही होते अन्यत्र पढ़ने से नहीं। बेरिस्टरी आदि पास लंदन में ही होता अन्यत्र नहीं। ऐसे ही श्राद्ध का सबसे उत्तम स्थान गया क्षेत्र ही है यह सर्वस्मृति सम्मत जानो।