अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 420, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥
अस्नात्वानैवभुञ्जीत द्विजश्चाग्निमपूजयन् ।
नपर्णपृष्ठे भुञ्जीत रात्रौदीपंविनातथा ॥ ४२ ॥
गृहस्थस्तुदयायुक्तो धर्ममेवानुचिन्तयेत् ।
पोष्यवर्गार्थसिद्धयर्थं न्यायवर्तीसबुद्धिमान् ॥ ४३ ॥
न्यायोपार्जितवित्तेन कर्त्तव्यह्यात्मरक्षणम् ।
अन्यायेनतुयोजीवे त्ससर्वकर्मबहिष्कृतः ॥ ४४ ॥
अग्निचित्कपिलासत्री राजाभिक्षुर्महोदधिः ।
दृष्टमात्राः पुनन्त्येते तस्मात्पश्येत्तु नित्यशः ॥ ४५ ॥
अरणिंकृष्णमार्जारं चन्दनंसुमणिंघृतम् ।
तिलान्कृष्णाजिनं छागंगृहेचैतानिरक्षयेत् ॥ ४६ ॥
गवांशतंसैकवृषं यत्रतिष्ठत्ययन्त्रितम् ।
तत्क्षेत्रंदशगुणितं गोचर्मपरिकीर्तितम् ॥ ४७ ॥
ब्रह्महत्यादिभिर्मर्त्यो मनोवाक्कायकर्मभिः ।
एतद्गोचर्मदानेन मुच्यतेसर्वकिल्विषैः ॥ ४८ ॥
विशेष कर ब्राह्मण को चाहिये कि-स्नान किये बिना और अग्नि को पूजे बिना भोजन न करे, पत्तों की पीठ ( उलटी पत्तल ) पर और रात्रि में दीपक के जलाये बिना अंधेरे में भोजन न करे ॥४२॥ दया युक्त हुआ गृहस्थ पुरुष धर्म की ही चिन्ता करे । अपने पोष्यवर्ग ( पुत्र वा भृत्य आदि ) के निर्वाह की सिद्धि के लिये बुद्धिमान् सदैव न्याय से प्राप्त धनादि का संचय करे ॥ ४३ ॥ न्याय के साथ धर्मानुकूल संचय किये धन से अपनी रक्षा करे । क्योंकि जो पुरुष अधर्म अन्याय से जीविका करता है वह सब कर्म धर्मों से बाहर (अनधिकारी) होजाता है ॥ ४४ ॥ चयन यज्ञ करने वाला, कपिला गौ, सत्रयज्ञ करने वाला, राजा, भिक्षु, ( संन्यासी ) समुद्र, ये सब दर्शन से ही दर्शन कर्त्ता को पवित्र कर देते हैं। तिससे इन का नित्य दर्शन करे ॥४५॥ अरणि, काला बिलाव, चन्दन, उत्तम मणि, घी, तिल, काला मृगचर्म, बकरा, इन को घर में रक्खा करे ॥४६॥ जितनी जगह में सौ गौ और एक बैल बिना बांधे खड़े हो सकें उस से दशगुणी जगह भूमि को गोचर्म कहते हैं ॥४७॥ इस गोचर्ममात्र भूमिके दान से मनुष्य मन, वाणी, और शरीर से किये ब्रह्महत्या आदि पापों से छूट जाताहै ॥४८॥
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