अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 654, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें८ शातातपस्मृतिः ॥
इत्युदीर्य्यमुहुर्भक्त्या तमाचार्य्यंक्षमापयेत् ।
एवंविधानेविहिते श्वेतकुष्ठीविशुद्ध्यति ॥ १२ ॥
कुष्ठोगोवधकारोस्यान्तरकान्तेऽस्यनिष्कृतिः ।
स्थापयेद्घटमेकन्तु पूर्वोक्तद्रव्यसंयुतम् ॥ १३ ॥
रक्तचन्दनलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पाम्बरान्वितम् ।
रक्तकुम्भन्तुतंकृत्वा स्थापयेद्दक्षिणांदिशम् ॥ १४ ॥
ताम्रपात्रंन्यसेत्तत्र तिलचूर्णेनपूरितम् ।
तस्योपरिन्यसेद्देवं हेमनिष्कमयंयमम् ।
यजेत्पुरुषसूक्तेन पापंमेशाम्यतामिति ॥ १५ ॥
सामपारायणंकुर्यात्कलशेतत्रसामवित् ।
दंशांशंसर्षपैर्हुत्वा पावमान्यभिषेचने ॥ १६ ॥
विहितेधर्मराजानमाचार्य्यायनिवेदयेत् ॥ १७ ॥
यमोऽपिमहिषारूढो दण्डपाणिर्भयावहः ।
इस प्रकार भक्ति श्रद्धा से बारंबार प्रार्थना करके गुरु जी से अपराध क्षमा करावे। ऐसा विधान करने से श्वेत कुष्ठी शुद्ध होजाता है ॥ १२ ॥ गोहत्या करनेवाला नरक भोग के अन्त जन्मान्तर में कुष्ठी होता है। उस समय निम्न प्रायश्चित्त करे- पूर्वोक्त पंचरत्नादि सहित एक कलश स्थापित करे ॥१३॥ उस पर लालचन्दन का लेपन कर कण्ठ में लाल वस्त्र लपेटे। ऊपर लाल पुष्प धरे। इस प्रकार कलश को रक्तवर्ण करके पूजन स्थान के दक्षिणभाग में स्थापित करे ॥ १४ ॥ कूटे हुए तिलों से भरा तांबे का पात्र उस कलश के ऊपर धरे उसके ऊपर एक तोला सुवर्ण से बनायी यमराज देवता की प्रतिमा स्थापित करके मेरा पाप शान्त हो, ऐसी प्रार्थना करके पुरुष सूक्त से यमदेवता का पूजन करे ॥१५॥ सामवेदी विद्वान् कलश के समीप में सामवेद का पारायण करे। इस प्रकार बारह दिन त्रिकाल पूजन करके अन्त में सर्षप-सरसों द्वारा दशांश का होम कर पावमानी ऋचाओं से ब्राह्मण लोग यजमान का अभिषेक करें ॥ १६ ॥ यह विधान होजाने पर धर्मराज की प्रतिमा आचार्य को देदेवे ॥ १७ ॥ दण्ड हाथ में लिये भैंसापर सवार दक्षिण दिशा के स्वामी भय कर यमराज मेरे पाप को