भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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भाषाधर्मसंहिता ॥ ३१

विनश्येत्पात्रदौर्बल्यात्तच्चपात्रंरसाश्चते ॥ ३० ॥
एवंगांचहिरण्यंच वस्त्रमश्वंमहींतिलान् ।
अविद्वान्प्रतिगृह्णानो भस्मीभवतिदारुवत् ॥ ३१ ॥
नाङ्गनखवादनं कुर्यान्ननखैश्च भोजनादौ ॥३२॥ न चा-
पोऽञ्जलिना पिबेत् ॥३३॥ न पादेन पाणिना वा जलमभिह-
न्यान्न जलेन जलम् ॥ ३४ ॥ नेष्टकाभिः फलानि पातयेत्
॥ ३५ ॥ न फलेन फलंन कल्केन कुहको भवेत् ॥३६॥ नम्ले-
च्छभाषां शिक्षेत ॥ ३७ ॥ अथाप्युदाहरन्ति ॥ ३८ ॥
नपाणिपादचपलो ननेत्रचपलोभवेत् ।
नस्यादङ्गचपलोविप्र इतिशिष्टिस्यगोचरः ॥ ३९ ॥
पारंपर्यागतोयेषां वेदःसपरिवृंहणः ।
तेशिष्टाब्राह्मणा ज्ञेयाःश्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥४०॥
यन्नसन्तंनचासन्तं नाश्रुतंनबहुश्रुतम् ।


वस्तु पात्र के निर्बल होने से वह पात्र और दूध आदि रस नष्ट होजाते हैं ॥ ३० ॥ ऐसे ही गौ सुवर्ण वस्त्र घोड़ा भूमि और तिल आदि पदार्थों का दान लेता हुआ मूर्ख ब्राह्मण काष्ठ के तुल्य भस्म होजाता है ॥ ३१ ॥ शरीर के अङ्गों तथा नखों को न बजावे । दांतों से नखों को न काटे ॥ ३२ ॥ अञ्जलि से जल न पीवे ॥ ३३ ॥ पांव वा हाथ से जल को न पीटे न ताड़ना करे और न जल से जल की ताड़ना करे ॥३४॥ ईंटों से फलों को न गिरावे ॥३५॥ फल से फल को झाड़के न गिरावे दम्भ वा पाप में तत्पर हो के धर्म से शून्य न होवे ॥३६॥ फारसी आदि म्लेच्छ भाषा को न सीखे ॥३७॥ इस पर श्लोक कहते हैं ॥३८॥ हाथ पांव आंखें तथा शरीर के अन्य अङ्गों द्वारा चपलता दिखाने वाला ब्राह्मण न हो, यही शिष्ट होने का मार्ग है ॥ ३९ ॥ जिन के यहां कुल परम्परा से वेद वेदाङ्गों के पढ़ने जानने की परिपाटी निष्कारण धर्म बुद्धि से चलीआती है वे श्रुति को ही साक्षात्प्रमाण मानने वाले ब्राह्मण शिष्ट कहाते हैं ॥ ४० ॥ जो कोई धनादि के होने न होने को, विद्वान् अविद्वान् को और सदाचारी दुराचारी को कुछ नहीं जानता इत्यादि को अभेद दृष्टि से देखता