भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 764, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 764

७४ | वसिष्ठस्मृतिः ॥

साचेदक्षतयोनिःस्यात् पुनःसंस्कारमर्हति । इति ॥ ६६ ॥
प्रोषितपत्नी पञ्चवर्षाण्युपासीतोर्ध्वं पञ्चभ्यो वर्षेभ्यो भ-
र्तृसकाशं गच्छेत् ॥ ६७ ॥ यदि धर्मार्थाभ्यां प्रवासं प्रत्यनुका-
मा न स्याद् यथाप्रेतएवं वर्त्तितव्यं स्यात् ॥ ६८ ॥ एवं ब्राह्म-
णी पञ्च प्रजाताऽप्रजाता चत्वारि, राजन्या प्रजाता पञ्चाऽप्रजाता
त्रीणि, वैश्या प्रजाता चत्वार्यप्रजाता द्वे, शूद्रा प्रजाता त्रीण्यप्र-
जातैकम् ॥ ६६ ॥ अत ऊर्ध्वं समानोदकपिण्डजन्मर्षिगोत्रा-
णां पूर्वः पूर्वो गरीयान् ॥ ७० ॥ नतु खलु कुलीने विद्यमाने
परगामिनी स्यात् ॥ ७१॥ यस्य पूर्वेषां षण्णां न कश्चिद् दायादः


निकृष्ट कोटि है। इस से आगे शास्त्र मर्यादा से द्वितीय विवाह कदापि नहीं हो सकता किन्तु सप्तपदी के बाद में अन्य के साथ विवाह करना विवाहित स्त्रियों के अन्य व्यभिचार के तुल्य वह भी व्यभिचार नाम जार कर्म माना जायगा ) ॥ ६६ ॥ विदेश में गये पुरुष की पत्नी पांच वर्ष तक अपने पति की बाट देखे उस के उपरान्त पति के समीप देशान्तर में चली जाये ॥६७॥ यदि धर्म वा धन के कारण पति का विदेश जाना न चाहती हो और वह चला ही जावे तो पति के मर जाने पर विधवा होने के समान विधवाओं के धर्म का पालन करे ॥ ६८ ॥ इसी प्रकार ब्राह्मणी के कोई सन्तान हो तो पाच वर्ष तक और सन्तान न हुआ हो तो चार वर्ष तक विदेश गये पति की बाट देख कर विदेश को जावे । क्षत्रिया स्त्री सन्तान वाली हो तो पांच वर्ष तक तथा सन्तान न हुए हों तो तीन वर्ष तक बाट देखे । वैश्या स्त्री सन्तान वाली हो तो चार वर्ष तक तथा बिना सन्तान की हो तो दो वर्ष तक बाट देखे । और शूद्रा स्त्री सन्तान वाली हो तो तीन वर्ष और बिना सन्तान की हो तो एक वर्ष तक विदेश गये पति की बाट देख कर पति के समीप चली जावे । ब्राह्मणी आदि स्त्रियों में क्रमशः धर्म के न्यूनाधिक भाव से काम भी न्यूनाधिक सतावेगा यह आशय धर्म शास्त्र कार ने दिखाया जताया है ॥ ६९ ॥ समानोदक, सपिण्ड, और एक गोत्र इन में पर २ की अपेक्षा पूर्व २ के साथ सम्बन्ध वा मेल होना अन्तरङ्ग होने से श्रेष्ठ है ॥ ७० ॥ कुलीन स-मानोदकादि पुरुष के विद्यमान होते हुए स्त्री अन्य के साथ नियोगादि न करे ॥ ७१ ॥ जिस पुरुष के पूर्वोक्त छः पुत्रों में से कोई भी दायभागी न हो