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अष्टाध्यायी सूत्रपाठ (महर्षि पाणिनि - पदच्छेद एवं यतिबोध सहित सम्पूर्ण ८ अध्याय)

अष्टाध्यायी सूत्रपाठ (महर्षि पाणिनि - पदच्छेद एवं यतिबोध सहित सम्पूर्ण ८ अध्याय)

Ashtadhyayi Sutrapatha of Maharshi Panini

महर्षि पाणिनि द्वारा

DevanagariSanskritpublished102 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 102 में से

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पृष्ठ 95

( छ ) कृतज्ञता-प्रकाश-यद्यपि यह नवीन ग्रन्थ-निर्माण किसी विशेष बुद्धि तथा विद्वत्ता की अपेक्षा नहीं रखता है तथापि नवसृजनात्मकता की दृष्टि से यह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण तथा परमोपयोगी है। इस सम्पूर्ण कृत्य के लिये हम अपनी सम्पूर्ण विद्याओं के गुरु, परमादरणीय, प्रातःस्मरणीय, परमविद्वान् गुरुवर्य 'आचार्य विजयपाल विद्यावारिधि जी' का अत्यन्त हार्दिक रूप से आभार व्यक्त करते हैं जिनके साक्षात् मुखारविन्द से हमने वैदिक वाङ्मय का विधिवत् एवं यथाशक्ति अध्ययन किया तथा जिनके आशीर्वचन हमारे लिये स्वाभाविक रूप से ही निरन्तर प्राप्त होते रहते हैं जिन्हें प्राप्त करके ही हम किसी भी प्रकार के महत्त्वपूर्ण कार्य को पूर्ण करने में सफल हो पाते हैं। इनके अतिरिक्त हम अपने परमादरणीय स्वर्गीय बाबा जी एवं दादी जी, परमादरणीय, परमविद्वान् पितृवर्य 'आचार्य चन्द्रदत्त शर्मा जी' तथा माता जी, संस्कृत तथा संस्कृति के कार्यों के लिये हमारा सतत उत्साहवर्धन करनेवाली, अपने अत्यन्त हार्दिक, सात्त्विक एवम् आत्मिक प्रेम से हमारे हृदय को निरन्तर सींचनेवाली, अत्यन्त सेवापरायणा, पतिव्रता, हमारी हृदयेश्वरी, अपनी धर्मपत्नी का विशेष रूप से आभार व्यक्त करते हैं जिनके वास्तविक एवं व्यावहारिक सत्प्रयासों तथा हार्दिक शुभकामनाओं से ही हम यह कार्य पूर्ण कर पाने में सफल हो सके हैं। इनके अतिरिक्त हम अपने सभी भाईयों, बहनों, सभी निकटदूरस्थ बन्धु-बान्धवों तथा अपने सभी अभिन्नहृदय परममित्रों 'आचार्य भरत कुमार जी' आदि का भी हृदय से अत्यन्त आभार व्यक्त करते हैं जिनकी सर्वदैव निष्छल, निःस्वार्थ शुभकामनायें हमें सर्वदैव प्राप्त होती रही हैं जिस कारण हम यह कार्य पूर्ण कर पाने में सफल हो सके हैं। उपर्युक्त सभी की स्नेहमयी कृपा, आशीर्वाद तथा शुभेच्छाओं को ही हम इस कार्य की सफलता का श्रेय तथा धन्यवाद प्रदान करेंगे जिन्हें प्राप्त करके हम इस कार्य को पूर्ण करने में सफल हुये तथा भविष्य में भी दुरूह से दुरूह कार्यों में सफलता प्राप्त करते

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