भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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वमनविरचनविधिध्यायः १८ ]

सूत्रस्थानम्

२२१

वमनकारक औषधद्वय एवं प्रयोगविधि—ऊपर कहे गये पद्यों द्वारा कौन वमन-विरचन के योग्य हैं और कौन अयोग्य हैं, इसका भलीभांति निर्णय कर लेने के बाद साधारण ( समशीतोष्ण ) काल में विधिपूर्वक स्नेहन एवं स्वेदन कराकर अगले दिन जिसे वमन कराना हो, उसे एक दिन पहले मछली का मांस, उड़द तथा तिल के भक्ष्यों को खिलाकर उसके कफदोष को उभाड़ कर उसे रात्रि में सुला दें। प्रातःकाल उसके उठ जाने पर उसे देखें, रात्रि में खाया हुआ भोजन पच गया हो तो इष्टदेव का स्मरण एवं पूजन कर मंगलाचार करके उसे बिना कुछ अन्न खिलाये उसका स्नेहन करके पेया के साथ घी पिलायें। यदि वह व्यक्ति बुद्ध, बालक, दुर्बल, क्लोह है अथवा वमन के कष्ट से डरने वाला है तो उसे रोग के अनुसार मद्य ( शराब ), दूध, गन्ने का रस अथवा मांसरस भरपेट पिला दें। उसके बाद रोग के अनुसार उसका कोष्ठ मुटु है या क्रूर है, इसका विचार करके मद्य तथा संधानमक मिलाकर किसी वमनकारक औषध को ' ब्रह्मदक्षायिबि' इत्यादि मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर रोगी का पूर्व की ओर मुख कराकर उसे औषध पिला दें॥ १२-१७॥

मन्त्रार्थ —'ब्रह्मा, दक्षप्रजापति, अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, भूमि, चन्द्र, सूर्य, वायु, अग्नि, औषधिसमूह सहित समस्त ऋषिगण, पंच महाभूत आप सब की रक्षा करें। जिस प्रकार महर्षि च्यवन आदि महर्षियों के लिए रसायन, देवताओं के लिए जैसे अमृत और जैसे उत्तम नागों के लिए सुधा ( विष ) हितकर होता है, उसी प्रकार यह औषध तुम्हारे लिए हितकर हो'।

वक्तव्य —'ब्रह्मरुद्राश्वि'...तै'। ( च.क. ११४ ) ये दोनों श्लोक महर्षि वामभट ने अविकलरूप से चरक से लिये हैं। इनकी विस्तृत व्याख्या का अवलोकन 'चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी' से प्रकाशित चन्द्रिका व्याख्यायुक्त चरकसंहिता-उत्तरार्ध में देखें।

—पीतो मूर्हतमनुपालयेत्। तस्मनाः—

वमन की प्रतीक्षा—इस प्रकार वमनकारक औषध को पीकर उसी की ओर मन लगाकर कुछ देर तक वमन होने की प्रतीक्षा करें।

—जातहूल्लासप्रसेकच्छद्वयेतः॥ १८॥

अङ्गुलिभ्यामनायस्तो नालेन मुदनाऽथवा। गलतात्वरुजन् बेगानप्रवृत्तान् प्रवर्तयन्॥ १९॥ प्रवर्तयन् प्रवृत्तांश्च जानुतुल्यासने स्थितः। उभे पार्श्वे ललाटं च वमत्श्यास्य धारयेत्॥ २०॥ प्रपीडयेत्तथा नाभिं पृष्ठं च प्रतिलोमतः।

वमनकारक यत्न—जब जी मिचलाने लगे, मुख से लार गिरने लगे तब वमन करें। यदि वमन भलीभांति न हो रहा हो तो बिना बल लगाये दो अँगुलियों को मुख में डालकर अथवा कोमल एरण्ड की पत्ती की नली को मुख में डालकर गला तथा तालु प्रदेश को बिना पीड़ित करते हुए जो वमन के वेग नहीं आ रहे हैं उन्हें प्रवृत्त करें और जो वेग प्रवृत्त हैं उन्हें भी अधिक प्रवृत्त करें, जिससे पूर्ण रूप से वमन हो जाय। ये सभी क्रिया-कलाप जानुभर ऊँचे आसन ( कुर्सी आदि ) पर बैठकर करने चाहिए। जब वमन के वेग आ रहे हों, उस समय उसका सहायक ( परिचारक ) उसकी दोनों पसलियों तथा सिर को दबाता रहे और वमन करने वाले की नाभि तथा पीठ को दबाता रहे॥ १८-२०॥

कफे तीक्ष्णोष्णकटुकैः पिप्ते स्वादुहिमैरिति॥ २१॥

वमेत् स्निग्धाम्ललवणैः संसृष्टे मरुता कफे।

वमन में औषध-प्रयोग—कफजनित रोगों में तीक्ष्ण, उष्णवीर्य तथा कटुरस वाले औषधद्वयों से वमन कराना चाहिए, पिप्तजनित रोगों में मधुर तथा शीतवीर्य द्रव्यों से और वातजनित रोगों में स्निग्ध, अम्ल एवं लवण रसयुक्त द्रव्यों से तैयार किये गये वामक द्रव्यों का प्रयोग करें॥ २१॥