अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वारविंशोऽध्यायः
अथातो गण्डूषादिविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ।
इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः ।
अब हम यहाँ से गण्डूष, कवल आदि की विधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे। जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था।
उपक्रम—पञ्चकर्म की परिधि में आने के कारण घुमपान का वर्णन करने के अनन्तर अब इस बाईसवें अध्याय में गण्डूष ( कुल्ला करना ), कवलग्रह ( मुख के भीतर ग्रास या कौर की भाँति औषध-द्रव्य को रखना ), प्रतिसारण, मुखालेपन, मूर्धतैल तथा कर्णपूरण विषयों का वर्णन किया जायेगा।
संक्षिप्त सन्दर्भ-संकेत—च.सू. ५; सु.चि. ४०; सु.उ. १८ तथा अ.सं.सू. ३१ में देखें।
चतुष्प्रकारो गण्डूषः स्निग्धः शमनशोधनौ । रोपणश्च—
गण्डूष के भेद—यह चार प्रकार का होता है—१. स्निग्ध ( जो मुख के भीतरी अवयवों को चिकना कर देता है ), २. शमन ( द्रोषशामक ), ३. शोधन तथा ४. रोपण ( मुख के भीतर उत्पन्न घावों तथा छालों को भर देने वाला )।
—त्रयस्तत्र त्रिषु योज्याश्चलादिषु ॥ १ ॥
अन्यो ब्रणजः—
गण्डूषों के प्रयोग—प्रथम तीन गण्डूष वात आदि दोषों में इस प्रकार प्रयुक्त होते हैं—स्निग्ध गण्डूष वातदोष में, शमन गण्डूष पित्तदोष में, शोधन गण्डूष कफदोष में और अन्तिम रोपण गण्डूष मसूड़ा, जीभ एवं तालुप्रदेश में उत्पन्न ब्रणों ( घावों ) को भरने के लिए होता है ॥ १ ॥
—स्निग्धोऽत्र स्वाद्वस्त्वपदुसाधितैः ।
स्नेहैः—
स्निग्ध गण्डूष—यह मधुररस तथा अम्लरस प्रधान द्रव्यों एवं विविध प्रकार के लवणों के संयोग से पकाये गये तैल, घृत, वसा आदि स्नेहों से तैयार किया जाता है।
—संशमनस्तित्तकपायमधुरीषधैः ॥ २ ॥
शमन गण्डूष—यह तित्तक, कपाय तथा मधुररस-प्रधान औषध-द्रव्यों के क्वाथों से तैयार कराकर प्रयोग किया जाता है। इनमें औषधद्रव्य का चुनाव चिकित्सक पर निर्भर होता है ॥ २ ॥
शोधनस्तित्तकद्रव्यपटूष्णैः—
शोधन गण्डूष—इसका निर्माण तित्तक ( नीम आदि ), कटु ( सोठ, मरिच, पिप्ली आदि ), अम्ल, लवण तथा उष्णवीर्य द्रव्यों के संयोग से किया जाता है।
—रोपणः पुनः ।
कपायतित्तकैः—
रोपण गण्डूष—इसका निर्माण कसैले तथा तित्तकस-प्रधान द्रव्यों के संयोग से किया जाता है।