भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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सिराब्यधविधिरध्यायः २७ ]

सूत्रस्थानम्

३०१

कफात् स्निग्धमसुक्पाण्डु तन्तुमप्लिच्छिन् धनम्।

कफदूषित रक्त के लक्षण—कफदोष से दूषित रक्त स्निग्ध ( चिकना ), पीले वर्ण वाला, तन्तुमत् ( लार के सदृश ), प्लिच्छिन् ( चिपचिपा ) तथा गाढ़ा होता है।

संयुष्टलिङ्गं संसर्गात्—

द्वन्द्वज रक्त के लक्षण—दो-दो दोषों द्वारा दूषित रक्त में उन-उन दोषों के लक्षण दिखलायी देते हैं, जिन्से वह रक्त युक्त होता है।

—त्रिदोषं मलिनाविलम् ॥ ४१ ॥

त्रिदोषज रक्त के लक्षण—त्रात आदि तीनों दोषों से दूषित रक्त मलिन वर्ण वाला तथा आविल ( गदला ) होता है ॥ ४१ ॥

अशुद्धौ बलिनोऽप्यन्नं न प्रस्थात्तावयेत्परम्। अतिसुतो हि मृत्युः स्याद्वाऋणा वा चलाभयाः ॥

सिरावेध में रक्त का परिमाण—बलवान् रोगी का भी अशुद्ध रक्त एक बार में एक प्रस्थ से अधिक नहीं निकालना चाहिए, क्योंकि अधिक मात्रा में रक्त के निकल जाने पर अत्यन्त कष्टकारक वातरोग हो सकते हैं अथवा मृत्यु भी हो सकती है ॥ ४२ ॥

वक्तव्य—सुश्रुत ने भी रक्तमोक्षण का १ प्रस्थ परिमाण माना है। 'बलवान्, प्रचुर दोष वाले तथा युवा पुरुष का अधिक-से-अधिक १ प्रस्थ रक्त निकालना चाहिए'। देखें—सु. शा. ८।१६। इस सम्बन्ध में कहा गया है—'वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे। सार्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहूर्मनीषिणः'। ( शा.सं.उ. ३।१८ ) इसके अनुसार १ प्रस्थ ६४ तोला का नहीं अपितु १३ १/३ पल = ५४ तोला का होता है। सिरावेध से निकले हुए रक्त का किसी चौड़े पात्र में संग्रह करके देखें कि कहीं अधिक रक्त तो नहीं निकल गया। क्योंकि अधिक रक्त न निकल जाय, अतएव कहा है—'देहस्थ रघिरे मूलं रघिरेणैव धार्यते। तस्माद्यलनेन संस्थं रक्तं जीव इति स्थितिः' ॥ ( सु.सू. १।४४ )

तत्राभ्यङ्करसक्षीररक्तपानानि भेषजम्।

विविध चिकित्सा—यदि अधिक मात्रा में रक्त निकल गया हो तो शीघ्र ही अभ्यंग, मांसरस, दूध अथवा बकरा आदि नीरोग प्राणी का रक्त उसे पिलाना चाहिए। इसे 'स्वयोनिवर्धन' चिकित्सा कहते हैं।

सुते रक्ते शतैर्यन्त्रमपनीय हिमाञ्चुना ॥ ४३ ॥

प्रक्षाल्य तैलप्लोताक्तं बन्धनीयं सिरामुखम्।

उपचार-विधि—यदि रक्त का स्त्राव अधिक मात्रा में हो गया हो तो तत्काल बन्धन को खोलकर उस सिरा के मुख को बरफ के पानी से धोकर उसके ऊपर तेल में भिगाया हुआ रुई का फाहा रखकर पट्टी बाँध दें ॥ ४३ ॥

अशुद्धं स्त्रावयेद्भ्यः सायमहृद्यपरैऽपि वा ॥ ४४ ॥

स्नेहोपस्कृतदेहस्थ पक्षाद्वा भृशदूषितम्।

पुनः सिरावेध—यदि कुछ अशुद्ध रक्त शेष रह गया हो तो उसका पुनः सिरावेध-विधि से उसी दिन सायंकाल अथवा दूसरे दिन रक्त-निर्हरण करा दें। अधिक रक्त दूषित हो तो रोगी को स्नेहन कराकर १५ दिन में फिर सिरावेध कराना चाहिए ॥ ४४ ॥

किञ्चिद्वि शेषे दुष्टास्ते नैव रोगोऽतिवर्तते ॥ ४५ ॥

सशेषमप्यतो धार्यं न चातिस्रुतिमाचरेत्।