भारतकोश
अष्टाङ्गहृदयम्

अष्टाङ्गहृदयम्

Ashtanga Hridayam

श्रीमद्वाग्भट द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished387 पृष्ठ

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शस्त्रकर्मविधिरध्यायः २९ ]

सूत्रस्थानम्

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ब्रणरोगी का आहार—ब्रणरोगी इस काल में अपनी प्रकृति के अनुकूल भोजन करे। जैसे—जौ, गेहूँ की रोटी, साठी के चावलों का भात, मसूर, मूंग, अरहर की दालें, जीवन्ती, सुनिष्णणक (चौपतिया), कच्ची मूली, बैगन, चौड़ाई, बथुआ, करेला, खेखसा, परवल, कुटकी के फलों का शाक, संधानमक, दाड़िम तथा आँवला के फल, घी, तपाकर शीतल किया गया जल, पुराने शालिचाबलों का गरम-गरम भात—जिसमें घी मिलाया गया हो—मात्रा में थोड़ा, बाद में गरम (गुनगुना) जल पीये और इनके साथ जांगल देश के प्राणियों के मांस अथवा मांसरस का भी सेवन करें। इस प्रकार के भोजनों का सेवन करने वाले ब्रणरोगी के घाव शीघ्र भर जाते हैं॥ ३४-३६॥

अशितं मात्रया काले पथ्यं याति जरां सुखम्॥ ३७॥

अजीर्णात्त्विनलिदादीनां विघ्नमो बलवान् भवेत्। ततः शोफरुजापाकदाहानाहानवान्पुयात्॥

लाभ एवं हानि—समय पर (भोजन काल में) मात्रा के अनुसार खाया हुआ हितकर आहार सुखपूर्वक पच जाना है। यदि भोजन ठीक प्रकार से पच नहीं पाता अर्थात् अजीर्ण हो जाता है, तो बात आदि दोषों का महान् प्रकोप हो जाता है। जिसके कारण ब्रणस्थान में शोथ, पीड़ा, पाक, दाह तथा आनाह (अफरा) आदि विकारों की उत्पत्ति हो जाती है॥ ३७-३८॥

नवं धान्यं तिलान् माषान् मद्यं मांसमजाङ्गलम्। क्षीरक्षुविकृतीरस्त्वं लवणं कटुकं त्यजेत्॥ ३९॥

यच्चान्यदपि विष्टम्भि विदाहि गुरु शीतलम्। वर्गादयं नवधान्यादिर्ब्रिगिनः सर्वदोषकृतम्॥ ४०॥

मद्यं तीक्ष्णोष्णरूक्षाम्लमाशु व्यापादेवद्व्रणम्।

त्याज्य आहार—नये धान्य, तिल, उड़द, मद्य, अनुपदेशीय प्राणियों (मुग एवं पक्षियों) के मांस, दूध से बना हुआ खोया आदि, ईब से बने हुए गुड़ आदि पदार्थ, आम, इमली आदि खट्टे पदार्थ तथा नमक, सौठ, मरिच, पीपल आदि पदार्थों का त्याग करें। और भी जो विष्टम्भकारक, विदाहकारक, पचने में देर करने वाले पदार्थ तथा शीतल हों उन सबका परित्याग करें। उक्त नवधान्यवर्ग ब्रणरोगियों के सभी दोषों को प्रकृपित कर देता है। जो मद्य तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष तथा अम्ल रसयुक्त होता है, वह पाक आदि उत्पन्न कर ब्रण को विकृत कर देता है॥ ३९-४०॥

बालोशिरैश्च वीज्येत न चैनं परिघट्टयेत्॥ ४१॥

न तुदेन्न च कट्टूयेच्छेष्टमानश्च पालयेत्। स्निग्धवृद्धिज्जातीनां कथाः शृण्वन्मनःप्रियाः॥ ४२॥

आशावान् व्याधिमोक्षाय क्षिप्रं ब्रणमपोहति।

ब्रणोपचारार्थ उपदेश—मक्खियाँ आदि उस ब्रण पर न बैठें इसलिए बालों से बने हुए चैवर या पंखे से ब्रण के ऊपर हवा करता रहे, ब्रण के ऊपर किसी प्रकार का दवान न दें, न उसे सूई आदि से खोदें, न खजुरालें, चलते-फिरते, उठते-बैठते उसकी रक्षा करें। प्रियजनों, महापुरुषों तथा ब्राह्मणों से मनोनुकूल कथाएँ सुना करें। रोग ठीक हो जायेगा—इस विषय में आशा रखे, निराश न हो। ऐसे व्यक्ति का शीघ्र ही ब्रण भर जाता है॥ ४१-४२॥

तृतीयेऽह्नि पुनः कुर्याद् ब्रणकर्म च पूर्ववत्॥ ४३॥

प्रक्षालनादि, दिवसे द्वितीये नाचरेत्तथा। तीव्रव्ययो विद्यथितश्चिरात्संरोहति ब्रणः॥ ४४॥

पुनः प्रक्षालन आदि कर्म—फिर तीसरे दिन ब्रणप्रक्षालन आदि कर्म पहले की भाँति करें। दूसरे ही दिन इसलिए न करें क्योंकि ब्रणस्थान अभी कमजोर ही रहता है, अतः उसमें अत्यन्त कष्ट होगा। इस प्रकार जल्दी-जल्दी प्रक्षालन आदि कर्म करने से ब्रणरोपण देर में हो सकेगा॥ ४३-४४॥

वत्कव्य—देखें—सू. ५।३५। वास्तव में वाग्भट के ये पद्य सुश्रुतोंक मद्य के ही पद्यानुवाद हैं।

स्निग्धां रूक्षां श्लथो गाढां दुर्नस्तां च विकेशिकाम्। ब्रणे न दद्यात्कल्कं वा—

२१ अ० ६०