अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 386, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गहृदये
| अ० | अंक | | अ० | अंक | | अ० | अंक ---|---|---|---|---|---|---|---|--- स्नानमर्दिनवेनास्य | २ | १८ | स्पृष्टे पूरस्य सञ्चारो | २९ | ६ | स्वेदातियोगाच्छर्दिश्च | १७ | १७ स्नानानुलेपनहिमा | ७ | ७६ | स्मृतिमेधायुरारोग्य | ७ | ७५ | स्वेदोऽतिस्वेदीर्गन्ध | ११ | १४ स्निग्धं शीतं गुरुं स्वाः | ६ | ८४ | स्यादुदाक्शाङ्गुलोऽलावु | २५ | २७ | स्वेदो हितस्वनात्रेयो | १७ | २८ स्निग्धं सोमात्मकं शुद्ध | ११ | २८ | स्याद्यङ्गुलवित्सारः | २६ | ३३ | स्वेद्यसंशोध्यमद्यस्त्री | १६ | ५ स्निग्धः शीतो गुरुर्मन्दः | १ | १२ | स्रोतोऽशङ्कुफेनाले | २४ | १६ | स्वोन्मागार्धचतुर्थांश | २६ | ४ स्निग्धद्रवोष्णध्वनोत्थ | १६ | ३६ | स्रोतोमार्दवक्रुत्स्वेदी | ६ | २८ | ह | | स्निग्धरिवजोत्तमाङ्गुर्य | २० | १७ | स्वं स्वमुक्तानि यन्त्राणि | २५ | ३९ | हन्ति दोषत्रयं कुच्छं | ६ | ७४ स्निग्धां रुक्षां श्लक्ष्णं | २९ | ४५ | स्वकर्म्मगुणहानिः स्यात् | २८ | ६ | हरिणैण्कुट्टर्घसं | ६ | ४३ स्निग्धसं गन्धः स तीक्ष्णश्च | २१ | २ | स्वानशय्यासुखाभ्यङ्ग | १४ | ११० | हरेणुमात्रा पिण्डस्य | २३ | १५ स्निग्धोमा स्वादुतिक्तोष्णा | ६ | २४ | स्वप्नेन रात्रौ कालस्य | २३ | १९ | हरेदहैवलात् दोषान् | १८ | ५१ स्नेहकिल्बिन्ना कोष्ठागा | १७ | २९ | स्वयादजीर्णो सञ्जात | ८ | ३० | हर्म्यपुष्टे वसेद्राष्ण | ३ | ४८ स्नेहनं पयसा पिष्टे | २४ | १५ | स्वस्थानस्य कायात्रे | ११ | ३४ | हर्म्यं क्रोधं भयं चापि | २९ | ७९ स्नेहशोधनयुक्तयेवं | १९ | ६७ | स्वस्थानस्थस्य समता | १२ | २४ | हारितमार्गं हारिद्र | ७ | ४४ स्नेहसर्पप्रभाहानिः | ७ | १२ | स्वातुं निदाचे शरदि | ३ | ५६ | हासस्य दन्तकाष्ठस्य | २१ | ६ स्नेहस्वेदैस्तथोत्कलिष्टः | १८ | ५९ | स्वादुः पट्टश्च मधुरम् | ९ | २१ | हितं विषमर्णं तत्र | ४ | १५ स्नेहस्वेदी प्रयुज्जीत | १८ | ५८ | स्वदुपाकरसं नातिशीतोष्णं | ६ | १६९ | हिप्पाकासविषश्चास | ६ | १०८ स्नेहम्बेदीषधोल्लेकेश | १८ | ४५ | स्वादुपाकरसं स्निग्धं | ६ | १२२ | हिप्पाघ्नानानिल्लेख्य | ५ | १७ स्नेहेन स्वेदनस्तीक्ष्णो | १० | १३ | स्वादुपाकरसाः स्निग्धा | ६ | ४ | हिमवन्मल्योद्भूतो | ५ | १० स्नेहपीता तनुरिव | २४ | १२ | स्वादुपाकरसाः स्निग्धा | ६ | ११६ | हीनवेगः कणाधारी | १८ | २३ स्नेहपीते प्रयुक्तेषु | २७ | ८ | स्वातुं रुक्षं सलवणं | ६ | ९५ | हीनानायांतिनिपुण | २ | ४९ स्नेहस्य कल्पः सश्रेष्ठः | १६ | १७ | स्वादुल्लं शीतमुष्णं च | ६ | १३५ | हीनोऽर्थनेन्द्रियस्याल्पः | १२ | ३६ स्नेहस्यान्याभिभूतत्वा | १६ | १६ | स्वितं निष्पीडितरसं | ६ | ९६ | हृद्यं पटोलं कुमिनूत् | ६ | ७९ स्नेहान् यथास्वमेतेषां | १६ | ४५ | स्वेदः क्लेदः सुतिः कोयः | १२ | ५२ | हृद्यः केशयो गुरुत्व्यः | ६ | ११० स्नेहानामुत्तमं शीतं | ५ | ३९ | स्वेदनं गृहं तीक्ष्णोष्णं | १७ | १८ | हृद्यदीपनभैषज्य | ४ | २९ स्नेहोच्चिताश्च ये स्नेहाः | १६ | ३८ | स्वेदनं फलवर्तिं च | ८ | १६ | हृदोगकामलशिवत्र | १४ | २८ स्नेहोदेगः बलमः सम्यक् | १६ | ३१ | स्वेदनं स्तम्भनं श्लक्षणं | १७ | १९ | हृदययामुनसङ्गङ्ग | ४ | २० स्नेहोपरकृतदेहस्य | २७ | ४५ | स्वेदेषपधुमांस्ततो | ७ | १३ | हस्तने जीर्णं एवान्ते | १४ | १९ स्पृष्टे तु कण्डूदाहोपा | ७ | १९ | स्वेदस्तापीपनाहोष्य | १७ | १ | हृत्वमध्योत्तमा मात्रा | १६ | १८
॥ ३ ॥