अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआयुष्कामायाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
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अष्टांगहृदय का स्वरूप—महर्षि वामभट का कथन है कि द्धर-उधर बिखरे हुए उन प्राचीन तन्त्रों में से उत्तम-से-उत्तम ( सार ) भाग को लेकर यह उच्च्य ( संग्रह ) किया गया है। प्रस्तुत संग्रह-ग्रन्थ का नाम है—‘अष्टांगहृदय’। इसमें प्राचीन तन्त्रों में वर्णित विषय न अत्यन्त संक्षेप से और न अत्यन्त विस्तार से ही कहे गये हैं। ॥४॥
बक्तव्य—अन्य ( इसके पहले लिखी गयी ) संहिताएँ या तो अत्यन्त संक्षिप्त रही हैं; जैसे—रविगुप्त विरचित ‘सिद्धसारतन्त्र’, यह आज तक प्रकाशित नहीं हो पाया तथा अत्यन्त विस्तृत, जैसे—अष्टांगसंग्रह आदि। उसके बाद लिखा गया यह ‘अष्टांगहृदय’ ग्रन्थ ऐसा है जैसा मानव-शरीर में ‘हृदय’ होता है, ऐसा स्वयं ग्रन्थकार ने इसी ग्रन्थ के उत्तरस्थान (४०८९) में कहा है—‘हृदयमिव हृदयमेतत्’। अतिविस्तृत ग्रन्थ सरलता से सबके समझ में नहीं आता है, अतएव यह ग्रन्थ सर्वसामान्य के लिए बुद्धिगम्य होगा, सोचकर ही इसकी रचना की गयी है। अन्य प्राचीन संहिताओं की तुलना में ‘अष्टांगहृदय’ का प्रचार-प्रसार भी अधिक है।
कायबालग्रहोर्ध्वार्द्धशल्यदंष्ट्राजरावुषान् ॥५॥
अष्टावङ्गानि तस्याहुश्चिकित्सा येषु संभिता।
आयुर्वेद के आठ अंग—१. कायचिकित्सा, २. बालतन्त्र (कौमारभृत्य), ३. ग्रहचिकित्सा (भूतविद्या), ४. ऊर्ध्वगचिकित्सा (शालाक्यतन्त्र), ५. शल्यचिकित्सा (शल्यतन्त्र), ६. दंष्ट्राविषचिकित्सा (अगदतन्त्र), ७. जराचिकित्सा (रसायनतन्त्र) तथा ८. वृषचिकित्सा (वाजीकरण-तन्त्र) —ये आठ अंग कहे गये हैं। इन्हीं अंगों में सम्पूर्ण चिकित्सा आश्रित है ॥५॥
बक्तव्य—वामभट का यह पद्य अतिसंक्षेप का उदाहरण कहा जा सकता है, यद्यपि अन्य अंगों का अर्थ भले ही हम खींच-तान कर लगा लें, किन्तु ‘दंष्ट्रा’ शब्द से प्राणिज विष के बाद स्थावर विष तथा गरविष का अर्थ निकालना अत्यन्त दुष्कर कर्म है। आचार्य अरुणदत्त ‘दंष्ट्रा’ का अर्थ ‘पीडाकरणसामान्य’ करते हैं। यह किसी भी विष से सम्भव है। यदि ‘दंष्ट्रा’ शब्द को विष मात्र का उपलक्षण स्वीकार कर लिया जाय तो कुछ काम चल सकता है। आठों अंगों की गणना ऊपर कर दी गयी है, अब यहाँ उन अंगों का परिचय प्रस्तुत है।
(१) कायचिकित्सा—‘चिञ् चयने’ धातु से ‘घञ्’ प्रत्यय तथा ‘च’ के स्थान पर ‘क’ करने से इसकी निष्पत्ति होती है। ‘चीयते अस्त्रादिभिः’ इति कायः ‘अथवा’ ‘चीयते प्रशस्तदोषधातुमैः’ इति कायः दोनों ही व्युत्पत्तियाँ यहाँ अपेक्षित हैं। इसी में सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करने वाले आमाशय तथा पक्वाशय से उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि समस्त रोगों की शान्ति का उपाय किया जाता है। अतः इसे कायचिकित्सा नामक प्रथम अंग कहते हैं। यह ‘काय’ यौवन आदि अवस्थाओं वाला है। इस अंग के प्रधान तन्त्र ‘अग्निवेशतन्त्र’ (चरकसंहिता), भेलसंहिता तथा हारीतसंहिता आदि हैं।
(२) बालतन्त्र या कौमारभृत्य—बालकों के शरीर में परिपूर्ण बल तथा धातुओं आदि का अभाव होने के कारण इस अंग का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। क्योंकि इनकी सभी प्रकार की औषधियाँ भिन्न प्रकार की होती हैं। दूध भी इन्हें माता या धात्री (धाय = उम्माता) का देने की प्राचीन काल से व्यवस्था है, जिसका वर्णन साहित्यिक ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। यहाँ एक शंका होती है कि बालकों की भाँति वृद्धों की चिकित्सा का भी स्वतन्त्र उपदेश आचार्यों ने क्यों नहीं किया? इसका समाधान इस प्रकार है—वृद्धावस्था पूर्ण युवावस्था के बाद में आती है, अतः इसकी चिकित्सा का अधिकांश अंग कायचिकित्सा में ही समाविष्ट हो जाता है और जो कुछ अंश शेष रह जाता है, उसके निराकरण के लिए ७वें रसायनतन्त्र की व्यवस्था की गयी है। इस विषय का प्राचीन ग्रन्थ केवल ‘काश्यपसंहिता’ है, जो सम्प्रति खण्डित उपलब्ध