अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआयुष्कामाध्यायः १ ]
सूत्रस्थानम्
१३
तत्राद्या भारते ज्ञन्ति त्रयस्तिक्तादयः कफम् ॥ १५ ॥
कषायतिक्तमधुराः पित्तमन्ये तु कुर्वते ।
रसों का बात आदि पर प्रभाव—उनमें प्रथम तीन ( मधुर, अम्ल, लवण ) रस वातदोष को नष्ट करते हैं, तित्त, कटु, कषाय कफदोष को नष्ट करते हैं और कषाय, तित्त, मधुर रस पित्त को नष्ट करते हैं। इससे विपरीत रस वात, पित्त, कफ दोषों को बढ़ाते हैं ॥ १५ ॥
बक्तव्य—रसों का बात आदि पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है, इसकी चर्चा भगवान् पुनर्वसु ने इस प्रकार की है—‘तत्र दोषमेकैकं त्रयस्त्रयो रसा जनयन्ति, त्रयस्त्रयश्चोपशमयन्ति । तद्यथा—कटुतिक्त-कषाया वातं जनयन्ति, मधुराम्ललवणास्त्वेन’ शमयन्ति; कटुम्ललवणाः पित्तं जनयन्ति, मधुरतिक्त-कषायास्त्वेनचक्ष्मयन्ति; मधुराम्ललवणाः श्लेष्माणं जनयन्ति, कटुतिक्तकषायास्त्वेन शमयन्ति ॥ ( च.वि. १।६ ) अर्थात् तीन-तीन रस एक-एक दोष को पैदा करते हैं और तीन-तीन ही रस एक-एक दोष को शान्त करते हैं। यथा—कटु, तित्त, कषाय रस वातदोष को उत्पन्न करते हैं; मधुर, अम्ल, लवण रस इसे शान्त करते हैं। कटु, अम्ल, लवण रस पित्तदोष को उत्पन्न करते हैं; मधुर, तित्त, कषाय रस इसे शान्त करते हैं। कटु, अम्ल, लवण रस कफ को उत्पन्न करते हैं और कटु, तित्त, कषाय रस इसे शान्त करते हैं। यही अभिप्राय महर्षि वामभट का भी है।
शमनं कोपनं स्वस्थहितं द्रव्यमिति त्रिधा ॥ १६ ॥
द्रव्य का वर्णन—विधिभेद से द्रव्य तीन प्रकार का होता है—१. शमन ( वात आदि दोषों का शमन करने वाला ), २. कोपन ( वात आदि दोष को कुपित करने वाला ) तथा ३. स्वस्थहित ( स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य को बनाये रखने वाला ) ॥ १६ ॥
बक्तव्य—ये द्रव्य परस्पर विपरीत गुणवाले होते हैं। जैसे—जो द्रव्य शमन ( शान्तिकारक ) होता है, वह उस दोष को प्रकुपित करने वाला नहीं होता है। इसी प्रकार जो द्रव्य ‘कोपन’ होगा, वह शमन नहीं हो सकता है। इन गुणों की विपरीतता को आप इस प्रकार समझें—जैसे गुरु गुण से लघु गुण एवं शीत से उष्ण सदा विपरीत रहता है। यहाँ ‘इति’ शब्द भेदवाचक है। यही द्रव्य अन्य प्रकारों से दो प्रकार का या अनेक प्रकार का होता है।
शमन द्रव्य—जैसे—तैल, घृत, मधु। तैल—स्निग्ध, उष्ण, गुरु गुण वाला होने के कारण वातदोष का शमन कर देता है, क्योंकि तैल वातदोष के विपरीत गुण वाला होता है। घृत—मधुर, शीत, मन्द गुण वाला होने के कारण अपने से विपरीत गुण वाले पित्तदोष का शमन कर देता है। मधु—रूक्ष, तीक्ष्ण, कषाय गुण वाला होने के कारण अपने से विपरीत गुण वाले कफदोष का शमन कर देता है।
कोपन—जो द्रव्य वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा मूत्र आदि मलों को कुपित करता है, उसे कोपन कहते हैं। जैसे—यवक ( शुक्धान्य-विशेष में पठित द्रव्य; देखें—च.सू. ५।११ ), पाटल ( पाटल व्रीहि—त्रिकाण्डशेष ), माष ( उड़द ), मछली, आममूलक, सरसों का तेल, मन्दक, दधि, किलाट आदि। विरुद्ध पदार्थ—जैसे—दूध तथा मछली का एक साथ सेवन करना आदि।
स्वस्थहितम्—‘ऋतुचर्या’ नामक अध्याय में जिन-जिनका सेवन करने को और जिनका सेवन न करने को कहा गया है, उन सबको यथाविधि, विधि-निषेध के अनुसार स्वीकार करना ही स्वस्थ ( हितकर ) चर्या है। इसका विशेष विवरण अ.हृ.सू. के मात्राशित्तीय नामक ८वें अध्याय में विस्तार से देखें।
भगवान् पुनर्वसु ने त्रिविध द्रव्य का वर्णन करते हुए कहा है—‘किञ्चिद् दोषप्रशमनं किञ्चिद् धातु-प्रदूषणम्। स्वस्थवृत्तौ मतं किञ्चित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते’ ॥ ( च.सू. १।६७ ) अर्थात् कोई द्रव्य प्रकुपित वात