अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
पृष्ठ 8, कुल 387 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८ )
और उसका विश्व में सादर प्रचार-प्रसार हुआ। वाग्भट ने न केवल आत्रेय आदि महर्षियों के वचनों का अनुकरण मात्र किया है, अपितु प्रसंगोचित अभिनव विषयों का भी इसमें स्थान-स्थान पर समावेश किया है, जो चिकित्सा की दृष्टि से उपादेय हैं। इन्होंने उत्तरस्थान में उन रोगों के निदान तथा चिकित्सा का वर्णन किया है, जिनका वर्णन आरम्भ के निदान तथा चिकित्सास्थानों में नहीं हो पाया था, अतएव आयुर्वेद की बृहतत्रयी में परवर्ती विद्वानों ने ‘अष्टांगसंग्रह’ को छोड़कर ‘अष्टांगहृदय’ का समावेश कर डाला, जो कि इस ग्रन्थ की सर्वांगीण गुणवत्ता का ज्वलन्त प्रमाण है।
वास्तव में कालिदास के अनुसार—‘पुराणमित्येव न साधु सर्वं, नवीनमित्येव न चाप्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यात्यतद्वद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः’ ॥ (मालविका ११२) इसका आशय यह है कि पुरानी अथवा नयी सभी वस्तुएँ अपनी गुणवत्ता के कारण ही ग्राह्य एवं तद्विपरीत होने से त्याज्य होती हैं। ऐसा कोई मापदण्ड नहीं है कि पुरानी सभी वस्तुएँ अच्छी हों और नयी सभी वस्तुएँ अनुपादेय हों। तात्पर्य यह है कि अच्छी वस्तु अपने गुणों के प्रभाव से सबका मन आकर्षित कर ही लेती हैं। नारायणभट्ट ने अपने ‘प्रक्रियासर्वस्व’ ग्रन्थ में इस बात की प्रामाणिक चर्चा की है कि जिस विषय को पाणिनि ने कहा है, उसकी कमी को उसके परवर्ती वार्तिककार ने पूरा किया; उसमें जो कमी रह गयी थी उसे भाष्यकार पतञ्जलि ने तथा उसमें भी जो त्रुटि रह गयी थी उसे भोज आदि विद्वानों ने सुधारा-सँवारा। अतएव व्याकरण सम्प्रदाय में यह सिद्धान्त सुप्रसिद्ध है—‘यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम्’। आयुर्वेद के क्षेत्र में इसी प्रकार का प्रामाण्य महर्षि वाग्भट की कला का भी है।
भारतीय वाङ्मय में ‘वाग्भट’ का उल्लेख बहुत मिलता है। यथा—वृद्ध, मध्य, लघु तथा रसवाग्भट नामों से प्रायः चार वाग्भट प्रसिद्ध हैं। इनके अतिरिक्त भी अन्य साहित्यिक क्षेत्र में अनेक वाग्भट कृतिकार के रूप में पाये जाते हैं। हारीतसंहिता में आयुर्वेद के ये आचार्य बहुचर्चित हैं—‘चरकः सुश्रुतश्चैव वाग्भटश्च तथा परः। मुख्याश्च संहिता वाच्यास्तिस्र एव युगे युगे ॥ अत्रिः कृतयुगे वैद्यो द्वापरे सुश्रुतो मतः। कलौ वाग्भटनामा च गरिमात्र प्रदृश्यते’ ॥ महर्षि वाग्भट के वचनों का उल्लेख निश्चलकर ने चक्रदत्त ग्रन्थ की रत्नप्रभा व्याख्या में किया है। १३वीं शती के रसरत्नसमुच्चय के रचयिता वाग्भट को ही यहाँ ‘रसवाग्भट’ के नाम से स्मरण किया गया है, क्योंकि इनके पिता का नाम भी सिंहगुप्त था। पिता-पुत्र के नाम की समानता को आधार मानकर कुछ ऐतिहासिक विद्वान् अष्टांगहृदय तथा रसरत्नसमुच्चय के रचयिताओं को एक ही मानने का आग्रह करते हैं। इतना सब होने पर भी समय का अन्तराल दोनों को एक स्वीकार करने में बाधक सिद्ध होता है।
वृद्ध या प्रथम वाग्भट—ऐतिहासिकों की मान्यता के अनुसार इन्होंने पूर्ववर्ती आर्यसंहिताओं को अपने ग्रन्थ की आधारशिला बनाकर ‘अष्टांगसंग्रह संहिता’ की रचना की। उसके उत्तरस्थान अद्याप ५०।१३२-३३ में अपना संक्षिप्त परिचय भी दिया है। हमारे विचार से ये अपने जीवन के आरम्भ में वैदिक धर्मानुयायी थे और ‘अवलोकित’ नामक बौद्ध गुरु से दीक्षा लेने के बाद इनके विचारों में परिवर्तन आया, जिसका पूर्ण प्रभाव इनकी उत्कृष्ट रचना में परिलक्षित होता है। जहाँ बौद्धधर्म के अतिरिक्त वचनों का समावेश हुआ है, उसे आत्रेय आदि महर्षियों के वचनों का तथा इनके पूर्वश्रम का प्रभाव समझ लेना चाहिए। चिकित्सा-क्षेत्र का विषय ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ होता है। इसमें धार्मिक प्रभाव बाधक नहीं होता। प्रस्तुत वाग्भट ने वैदिकधर्म के साथ बौद्धधर्म का समुचित समन्वय अपनी कृतियों में स्थापित किया है। ऐसा अन्यत्र भी देखा जाता है। अवलोकितेश्वर की मूर्तियाँ गुप्तकाल में अधिकाधिक मात्रा में मिली हैं। कालक्रम में अवलोकितेश्वर की मूर्ति की भुजाओं की संख्या में वृद्धि होती गयी। देखें—कलकत्ता संस्कृत सिरोज XII-8.37-38. इसी के अनुसार वाग्भट ने अवलोकितेश्वर की १२ भुजाओं का उल्लेख किया है। वाग्भट के इस संग्रह तथा हृदय में मन्त्रयान का रूप तो दृष्टिगोचर होता है किन्तु वज्रयान का नहीं। बौद्ध ग्रन्थों में आठ प्रकार की सिद्धियों का जो वर्णन मिलता है, उनका उल्लेख वाग्भट ने रसायन प्रकरण