अष्टाङ्गहृदयम्
Ashtanga Hridayam
श्रीमद्वाग्भट द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान - निर्मला हिन्दी व्याख्या (डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 1999 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजैगानुत्पादनीयाध्यायः ४ ]
सूत्रस्थानम्
५९
निर्दिष्टं साधनं तत्र भूयिष्ठं ये तु तान् प्रति ॥ २२ ॥
तत्श्रानेकधा प्रायः पवनो यत्प्रकृष्यति। अन्नपानीयधं तस्य युज्जीतातोऽनुलोमनम् ॥ २३ ॥
सामान्य चिकित्सा—वैगों को रोकने के कारण जो रोग होते हैं, उनकी चिकित्सा का वर्णन इसी प्रकार में ऊपर कर दिया गया है। ऊपर कहे गये कारणों से जो वातदोष का अनेक प्रकार से प्रकोप हो जाता है, उसकी शान्ति के लिए सामान्य रूप से उन-उन वैगों के जो अनुलोमक अन्न (आहार), पान (पेयपदार्थ) तथा औषध हैं, उन-उन का प्रयोग करना चाहिए ॥ २२-२३ ॥
वक्तव्य—इस प्रकार में वैगों को रोकने के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों की चिकित्सा ही प्रधान रूप से कही गयी है, किन्तु २२वें श्लोक के पूर्वार्ध में 'वैगोदीरण' शब्द का भी प्रयोग हुआ है, जो वैगधारण से भिन्न क्रिया है। इस उदीरण क्रिया में वायु की प्रधानता रहती है, अतः इसमें वायु का अनुलोमन करना ही प्रधान चिकित्सा है, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है।
धारयेतु सदा वैगान् हितैषी प्रेत्य चेह च। लोभेभ्यश्चिद्विषमात्सर्परागादीनां जितेन्द्रियः ॥ २४ ॥
धारणीय वैग—इस लोक में तथा परलोक में अपना भला चाहने वाला पुरुष (नर-नारी) लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, मत्सरता तथा राग-द्वेष आदि के वैगों को रोकने का सदा प्रयत्न करता रहे और सदा अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करता रहे ॥ २४ ॥
वक्तव्य—'लोभ'—इसका मिथ्यायोग हानिकारक होता है, क्योंकि 'लाभात् लोभः प्रवर्तते' अर्थात् जब लाभ होने लगता है तो लोभ की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। ईर्ष्या—डाह, जलन, दूसरे की सफलता को देखकर होने वाली एक मनःप्रवृत्ति, इसीलिए कहा गया है—'हेती ईर्षुः फले अनौर्षुः'। 'मत्सरता'—दूसरों को दुःखी देखकर प्रसन्न होना। राग—विषयों में मन की आसक्ति। द्वेष—दूसरों को हानि पहुँचाने का प्रयत्न करना।
भगवान् पुनर्वसु ने चरक-सूत्रस्थान ७।२६ से ३० तक कुछ धारणीय वैगों की परम उपयोगी चर्चा की है, इस प्रसंग में उनका भी अवलोकन अपेक्षित है। चरकोक्त कतिपय धारणीय वैग—मन के वैग—लोभ, शोक, भय, क्रोध, अभिमान, निर्लज्जता, ईर्ष्या, राग, अभिध्या (मन से दूसरे के साथ द्रोह करने की इच्छा करना)। वाणी के वैग—कठोर वचन, आवश्यकता से अधिक बोलना, चुगुलखोरी करना, झूठ बोलना, असामयिक बातें कहना। शरीर के वैग—दूसरों को मारना-पीटना, लूटना, किसी प्रकार का बलात्कार करना, चोरी करना, डाका डालना, लाठी-सोटा चलाना तथा लड़ाई करना। मनुष्य यदि विवेक-बुद्धि से काम ले तो इन कुकर्मों से वह बच सकता है, फलतः समाज में आदर पा सकता है। यही लक्ष्य है धारणीय वैगों को रोकने का। ऐसा करने से मनुष्य धर्म, अर्थ, काम इस त्रिवर्ग का संचय और भोग भी कर सकता है।
यतेत च यथाकालं मलानां शोधनं प्रति। अत्यर्थसञ्चिततास्ते हि क्रूढाः स्युर्जीवितच्छिदवः ॥ २५ ॥
शोधन की आवश्यकता—वात, पित्त, कफ इन तीनों दोषों तथा पुरोष आदि शारीरिक मलों का उचित समय पर संशोधन करने का प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि जब दोष अत्यधिक संचित हो जाते हैं तो वे कुपित होकर जीवन का विनाश कर सकते हैं ॥ २५ ॥
दोषाः कदाचित्कृष्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः। ये तु संशोधनैः शुद्धा न तेषां पुनरुद्भवः ॥ २६ ॥
संशोधन-कर्म की प्रशंसा—लंघन एवं पाचन क्रियाओं (उपचारों) से शान्त किये गये दोष समय पाकर कभी पुनः कुपित हो सकते हैं, किन्तु जो वमन, विरेचन आदि संशोधन-प्रकारों से शुद्ध कर दिये जाते हैं, उनका पुनः प्रकोप नहीं होता ॥ २६ ॥
वक्तव्य—वामट का यह उपर्युक्त छबीसवर्षों पद्य अविकल च.सु. १६।२० से लिया गया है। सचमुच यह पद्य सिद्धान्तों की दृष्टि से छोड़ने योग्य है भी नहीं। आयुर्वेदशास्त्र में शमन तथा संशोधन चिकित्सा की दो विधियाँ हैं। उनमें समय पर किया गया संशोधन-उपचार अधिक उपादेय होता है। अतः संचयकाल