भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

चौथा प्रकरण । ९७

में नहीं मानता है, किन्तु उनको अन्तःकरण का धर्म मानता है, इस वास्ते उसको पाप-पुण्य नहीं लगते हैं । अथवा जिसको पाप-पुण्य का विशेष ज्ञान होता है, उसी को पाप-पुण्य लगते हैं । बालक को या पागल को पाप-पुण्य का ज्ञान नहीं होता है, इस वास्ते उनको भी पाप-पुण्य नहीं लगते हैं । ज्ञानवान् को भी पाप-पुण्य का ज्ञान नहीं होता है क्योंकि वह अपने आत्मानन्द में मग्न रहता है, अतएव उसको भी पाप-पुण्य नहीं लगते हैं । इसी पर और दृष्टान्त कहते हैं—
जैसे आकाश का धूम के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, वैसे आत्मवित् का भी पुण्य और पाप के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना ।
यदृच्छया वर्त्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

आत्मा, एव, इदम्, जगत्, सर्वम्, ज्ञातम्, येन, महात्मना, यदृच्छया, वर्त्तमानम्, तम्, निषेद्धुम्, क्षमेत्, कः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
येन महात्मना =जिस महात्मा करकेयदृच्छया =प्रारब्धवश से
तम् =उस
इदम् सर्वम् =यह सम्पूर्णवर्त्तमानम् =वर्तमान ज्ञानी को
जगत् =संसारनिषेद्धुम् =निषेध करने को
आत्मा एव =आत्मा हीकः =कौन
ज्ञातम् =जाना गया हैक्षमेत् =समर्थ है ॥