अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 12, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला प्रकरण । ५
में, उनमें दोष-दृष्टि और ग्लानि होनी, और उसके त्याग की इच्छा होनी, और उनकी प्राप्ति के लिये किसी के आगे दीन न होना, इसी का नाम वैराग्य है । यह जनकजी के एक प्रश्न का उत्तर हुआ ।
प्रश्न—हे भगवन् ! संसार में नंगे रहने को भिक्षा माँगकर खानेवाले को लोग वैराग्यवान् कहते हैं और उसमें जड़भरत आदिकों के दृष्टांत को देते हैं । आपके कथन से लोगों का कथन विरुद्ध पड़ता है ।
उत्तर—संसार में जो मूढ़बुद्धिवाले हैं वे ही नंगे रहने वालों और माँगकर खानेवालों को वैराग्यवान् जानते हैं, और नंगों से कान फुकवाकर उनके पशु बनते हैं । परन्तु युक्ति और प्रमाण से यह वार्ता विरुद्ध है ।
यदि नंगे रहने से ही वैराग्यवान् होता हो, तो सब पशु और पागल आदिकों को भी वैराग्यवान् कहना चाहिए, पर ऐसा तो नहीं देखते हैं । और यदि माँगकर खाने से ही वैराग्यवान् हो जावे, तो सब दिन दरिद्रियों को भी वैराग्यवान् कहना चाहिए, पर ऐसा तो नहीं कहते हैं । इन्हीं युक्तियों से सिद्ध होता है कि नंगा रहने और मांगकर खानेवाले का नाम वैराग्यवान् नहीं ।
यदि कहो कि विचार-पूर्वक नंगे रहनेवाले का नाम वैराग्यवान् है, यह भी वार्ता शास्त्र-विरुद्ध है, क्योंकि विचार के साथ इस वार्ता का विरोध आता है । जहाँ पर प्रकाश रहता है, वहाँ पर तम नहीं रहता । ये दोनों जैसे परस्पर विरोधी हैं, वैसे सत्त्वगुण का कार्य-सत्य, और मिथ्या का विवेचन-रूपी विचार है और तमोगुण का कार्य नंगा रहना