भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 405 में से

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११८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

मुझ महान् समुद्र-रूपी आत्मा में जो जगत् की कल्पना है, सो भ्रम-मात्र ही है । वास्तव में नहीं है, क्योंकि मेरा अनन्तस्वरूप निराकार है । निराकार से साकार की उत्पत्ति नहीं बनती है । जब कि आत्मा में जगत् की वास्तव में उत्पत्ति नहीं बनती है, तो मैं प्रपंच से रहित शान्त-रूप होकर स्थित हूँ । एवं लय योगादिक भी मेरे को करना उचित नहीं हैं ॥ ३ ॥

मूलम् ।

नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने ।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

न, आत्मा, भावेषु, नो, भावः, तत्र, अनन्ते, निरञ्जने, इति, असक्तः, अस्पृहः, शान्त, एतत्, एव, अहम्, आस्थितः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
आत्मा = आत्मानो = नहीं है
भावेषु = देह आदि मेंइति = इस प्रकार
= नहींअसक्तः = संग-रहित
+ च = औरशान्तः = शान्त हुआ
भवः = देहादिअहम् = मैं
तत्र = उसएतत् एव = इसी आत्मा के
अनन्ते = अनन्तआस्थितः = आश्रित हूँ ॥
निरञ्जने = निर्द्वन्द्व आत्मा में

भावार्थ ।

आत्मा देहादिभावों में आधेय अर्थात् आश्रित-रूप करके

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