भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 405 में से

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पृष्ठ 128

आठवाँ प्रकरण ।

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मूलम् ।

तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद्वाञ्छति शोचति ।
किञ्चिन्मुञ्चति गृह्णाति किञ्चिद्धृष्यति कुप्यति ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, किञ्चित्, वाञ्छति, शोचति, किञ्चित्, मुञ्चति, गृह्णाति, किञ्चित्, हृष्यति, कुप्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदाजबकिञ्चित्कुछ
चित्तम्मनगृह्णातिग्रहण करता है
वाञ्छतिचाहता हैहृष्यतिप्रसन्न होता है
किञ्चित्कुछकुप्यतिदुःखित होता है
शोचतिसोचता हैतदातब
किञ्चित्कुछबन्धःबन्ध है ॥
मुञ्चतित्यागता है

भावार्थ ।

पहले के सात प्रकरणों द्वारा अष्टावक्रजी ने सब प्रकार से जनकजी के अनुभव की परीक्षा कर ली । अब इस आठवें प्रकरण में चार श्लोकों द्वारा अपने शिष्य के अनुभव की श्लाघा को करते हैं—

हे जनक ! जो तूने पूर्व कहा है कि मुझ अनन्त-स्वरूप आत्मा में त्याग और ग्रहण करने की कल्पना नहीं है, सो तूने ठीक कहा है । क्योंकि जब चित्त विषयों की इच्छावाला होकर किसी पदार्थ की प्राप्ति की इच्छा करता है और