भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 405 में से

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१३४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उधर से एक बरात आती थी । वह संन्यासी खड़ा हो गया और उसने पूछा, यह क्या है ? लोगों ने कहा, यह बरात है । यह जो लड़का घोड़ी पर सवार है, इसकी शादी एक लड़की से होगी । तब उसने पूछा, फिर क्या होगा, तो कहा, जब इसकी स्त्री इसके घर में आवेगी, तब दोनों आपस में विषयानंद को प्राप्त होवेंगे । फिर स्त्री के लड़के पैदा होवेंगे । इतना सुनकर वह संन्यासी चला गया । रास्ते में एक कुएँ पर छाया में सो रहा तब उसने स्वप्न देखा कि मेरी शादी हुई है, स्त्री आई है और मैं उसके साथ सोया हूँ । उस स्त्री ने कहा, थोड़ा सा पीछे हटो । जब वह हटने लगा, तब वह धम्म से कुएँ में गिर पड़ा । गिरने की आवाज को सुनकर लोग दौड़कर कहने लगे कि किसने तुझको कुएँ में गिरा दिया है ? उसने कहा, स्वप्न की स्त्री ने मेरे को कुएँ में गिरा दिया है, न मालूम जाग्रत् की स्त्री पुरुषों की क्या दुर्दशा करती होगी । तात्पर्य यह है कि विवेकी के लिये स्त्री साक्षात् नरक का कुण्ड है ।

प्रश्न—हे भगवन् ! कर्मकाण्डी कहते हैं कि जिसके पुत्र नहीं है, उसकी गति भी नहीं होती है, इस वास्ते येनकेन उपाय करके पुत्र उत्पन्न करना चाहिए, ऐसा 'देवी-भागवत' में लिखा है ।

उत्तर—हे प्रियदर्शन ! यह जो तुमने कहा है कि अपुत्र की गति नहीं होती है, सो गति शब्द का क्या अर्थ है । गति शब्द का अर्थ मोक्ष करते हो वा दोनों लोकों का सुख करते हो । यदि गति शब्द का अर्थ मोक्ष करो, तब सब पुत्रवालों की मुक्ति होनी चाहिए और मनुष्य, पशु आदिक सभी ज्ञान के