अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 150, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवाँ प्रकरण । १४३
पदच्छेदः ।
कृत्वा, मूर्तिपरिज्ञानम्, चैतन्यस्य, न, किम्, गुरुः, निर्वेदसमता युक्त्या, यः, तारयति, संसृतेः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निर्वेदसमता युक्त्या=$ | वैराग्य, समता और युक्ति द्वारा | संसृतेः = | संसार से |
| चैतन्यस्य = | चैतन्य के | + स्वम् = | अपने को |
| मूर्तिपरिज्ञानम् = | मूर्ति के ज्ञान को | तारयति = | तारता है |
| कृत्वा = | जानकर | किम् = | क्या |
| यः = | जो | सः = | वह |
| गुरुः न = | गुरु नहीं है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिसने विषय-वासना को त्याग करके शत्रु और मित्र में समबुद्धि करके, और श्रुति के अनुकूल युक्ति से सच्चिदानन्द-रूप अपने आत्मा का साक्षात्कार किया है, और जिसने अपने को ही सर्वरूप से अनुभव किया है, उसने संसार से अपने को तारा है, दूसरा नहीं । हे जनक ! तुम अपने ही पुरुषार्थ से मुक्त होगे, दूसरे करके नहीं होगे ।
प्रश्न— संसार में लोग कहते हैं कि गुरु शिष्य को मुक्त कर देता है । आप उसके विरुद्ध ऐसा कहते हैं कि शिष्य अपने पुरुषार्थ से ही मुक्त होता है, यह क्या बात है ?
उत्तर— हे प्रियदर्शन ! संसार के लोग प्रायः करके अज्ञानी मूर्ख होते हैं, वे शास्त्र के तात्पर्य को और गुरु-शिष्य शब्दों के अर्थ को नहीं जानते हैं । क्योंकि वे कामना करके