भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 152

नवाँ प्रकरण । १४५

देनेवाला है । तीसरा गुरु व्यावहारिक विद्या का पढ़ानेवाला है । चौथा सत्सङ्ग गुरु है ।

विद्या-दाता हजारों अक्षरों को पढ़ाता है, पशु से मनुष्य बनाता है, फिर भी लोग उसके उपकार को नहीं मानते हैं । जो दो चार अक्षरों के मन्त्र को कान में फूँक देता है, उसी के पूरे पशु बन जाते हैं । उसके उपदेश से कोई संशय दूर नहीं होता है, बल्कि उल्टी भेद-बुद्धि उत्पन्न होती है । कोई विष्णु का मन्त्र देकर महादेव से विरोधकरा देता है, कोई विष्णु से विरोध कराता है, कोई देवी का पशु बना देता है । कनफुकवे गुरु तो आप ही भेदवाद-रूपी कीच में फँसे हैं और शिष्यों को भी फँसाते हैं । अपनी जीविका के लिये शिष्यों के घरों में भिखारियों की तरह मारे-मारे फिरते हैं । जैसे वे मूर्ख हैं, वैसे उनके शिष्य भी मूर्ख हैं । क्योंकि जो सत् महात्मा संशयों का नाश करते हैं, उनकी वह सेवा-पूजा नहीं करते हैं । जो मूर्ख कनफुकवे गुरु संशयों में डालते हैं, उन्हीं की पूरी सेवा करते हैं ।

जब गुरु ही मोक्षमार्ग को नहीं जानते हैं, तब शिष्य कैसे जाने । शिष्यों के चित्तों में तो अनेक प्रकार के विषयों की कामनाएँ भरी हैं । उन कामनाओं की पूर्ति के लिये वे मन्त्र लेकर जपते हैं, और जपते जपते मर जाते हैं, परन्तु कामना किसी की भी पूरी नहीं होती है । इसी पर कबीरजी ने भी कहा है—

दोहा ।

गुरु लोभी, शिष्य लालची, दोनों खेलैं दाँव ।
दोनों डूबे बापड़े, बैठ पथर की नाव ॥ १ ॥