अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 158, कुल 405 में से
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दशवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम् ।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
विहाय, वैरिणम्, कामम्, अर्थम्, च, अनर्थसंकुलम्, धर्मम्, अपि, एतयोः, हेतुम्, सर्वत्र, अनादरम्, कुरु ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| वैरिणम्= | वैरी-रूप | हेतुम्= | कारण-रूप |
| कामम्= | कामना को | धर्मम्= | धर्म को |
| च= | और | अपि= | भी |
| अनर्थसंकुलम्= | अनर्थ से भरे हुए | विहाय= | छोड़कर |
| अर्थम्= | अर्थ को | सर्वत्र= | धर्म, अर्थ और काम के हेतु कर्मों को |
| विहाय= | त्याग करके | ||
| च= | और | ||
| एतयोः= | उन दोनों को | अनादरम् कुरु= | अनादर कर ॥ |
भावार्थ ।
पहले प्रकरण में विषयों के विना भी संतोष-रूप वैराग्य